एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextसमाज का जन-बल उनके साथ हो सकता था, राज्य व्यवस्था अत्याचारी शासक
के कारण प्रजाजन संगठित होकर राज्य की व्यवस्था उलट-पुलट कर देते
कंसराज का समय था, जो मथुरा का शासक, जो बड़ा प्रतापी व सौ चार अक्षौणी
सेना का, आठ लाख बावन हजार सौ चौरासी हाथी उस राजा के पास सेनापति थे। सौ चार
सेना का, दो लाख सत्रह हजार सौ बीस प्यादे थे, जो राजा के पास में जन-बल था
सेना बल था, जो अत्याचारी शासक हो गया था, जो अत्याचार कराया करताथा
प्रजाजनों पर अत्याचार कर रहा था।
जब ऐसा था, तो श्री कृष्ण भगवान् सारे समाज संगठन बनाकर संगठित हो गये... तो
कंसराज मारा गया और फिर उसके उपरान्त कंसराज का भाई था, जो कंस का ससुर था वो
सौ चार सेना थी?
उसने हमला किया, "जो मार पड़ा सो तो गया ही, पर उस अत्याचारी के स्थान
पर वो, जरा संध आ गया।"
उसने जरा संघ को भेजा, जो बड़ा पापी व दुष्ट
वो कैसा राजा कहलाया ? हाँ, उसने अट्ठारह सेना युद्ध लड़े और मथुरावासियों
सेनाओं को पराजित तो किया तथा मथुरावासियों को दुःखी कर दिया क्योंकि बार
बार आक्रमण किया और फिर सेना क्षय हुई, नर, नारी, प्रजा, बच्चे, भूख, प्यास
छटपटाने लग गये।
फिर श्री भगवान् वासुदेव विचार करने लग जाते हैं, अपने मनमें कि, प्रजाजन
दुःखी हैं, प्रजाने किस कारण जन्म लिया कि संकट सह सके? सब के सब भूख प्यास
चिन्ता सब संकट भोगते हैं। सब को सौ बार तो जन्म नहीं मिला है, इस वास्ते
इस जगह को त्याग दिया जाय। तब वो सब को साथ ले गये और मथुरा को खाली
कर के द्वारका जा कर के बसाया। सब को साथ ले गये। द्वारका नगरी बसाई, तो वो जो
द्वारका नगरी बस गई उस पर भी जरा संघ ने कई बार चढ़ाई की परन्तु वो पराजित
हुआ।
भगवान् को चिन्ता तो हर दम बनी रही समाज सुधार और राष्ट्रधर्म रक्षा की।
कंसराज को तो मार-कर निष्कंटक राज्य चलाया, पर पाण्डवों अथवा उस समय के
राजा आपस आपसमें, सब लड़कर भस्म हो गये। कौरव, सब आपस में लड़ पड़े
और छल-बल, कपट-बल, छल-कपट नीति से, जो पाण्डव राज्य धर्म अनुरागी तथा धर्म
के ही पक्षपाती? पाण्डव, धर्म पक्षपाती कहलाये, सब पाण्डवों का यश था धर्म व
न्याय, पर दुष्ट कौरवों ने सब राज्य छीन लिया, तो भगवान् वासुदेव दोनों को न्याय
नीति से समझाना चाहा व चाहाकि वो आधा राज पाण्डवों को देदें, तो
पाण्डव अपना राज करलेंगे, पर उन्होंने नहीं दिया।
उस महाभारत संग्राम-स्थल में जब अर्जुन--उसने देखा दोनों ओर अपनी सारी
रिश्ते नातेदारी को व अपनी वंशीयता बन्धुता को और वह सब सम्बन्धी थे पाण्डवों कौर-
वोंके सगे भाई; कोई ताऊ, चाचा, भाई, भतीजा, सब ही थे, अपना गोत्र एक था,
सो सब को मारा, सबको देखकर, अर्जुन ने अपने मनमें बड़ा भारी संशय किया
विचार किया जिससे उसका हृदय जो पिघल गया--अर्जुन, रोनेलगा।
तो यह बात तो भगवान् ने, अर्जुनको समझाते हुए तो कही थी, कि
महा बलशाली महाबली क्षत्रिय तू बन कर आया है! तू रणमें आ कर सब को मार कर
विजय कर, यश लाभ कर व राज्य कर या निष्कंटक राज्य कर!
भगवान् श्री वासुदेव सब को एक देखना चाहतेथे, प्रजा को एक
बनाना चाहतेथे निष्कंटक तो करना चाहते ही थे कि सब धर्मानुयायी बनें या एक
ही धर्म पर आचरण करें सब सत्य धर्म का पालन करें और फिर, जो अनाचारी
पापाचारी हैं उनका विनाश हो और निष्कंटकराष्ट्र बन जावे ताकि प्रजा धर्मानुसार
अपने मन धर्म और अपने कर्म को करने लग जावे। उस समय श्री वासुदेव भगवान्
को परमपिता परमात्मा रूप माना गया।
भगवान् वासुदेव के जीवन की जो कथा है, सो सदा समाज के लिए सब ही
युग में मार्ग दर्शन का काम कर सकती है। सब के लिए धर्म की ही शरण एक ही
भगवान् का काम है। पाण्डवों के धर्म व राज्य नीति मर्यादा की रक्षा माता-पिता
समान होकर भगवान् श्रीकृष्णने निभाई है। उन्होंने देखा, जब अर्जुन मोह-माया में
ग्रस्त हो गया, जिसने रण में गाण्डीव फेंक व रो पड़ा। तब दयालु रूप व धर्म
स्वरूप बन व मित्र का धर्म निभा कर उपदेश दिया कि, रणमें मोह क्षत्रियों के
योग्य न हो कर रण का धर्म क्षात्र-धर्म ही सब कुछ बतलाता अन्याय विनाश ही सब
कुछ सब धर्म कर्म कर्तव्य जान जीवन का हर कदम उठाना ही धर्म
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