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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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तब उसने, या तो उस समय उसके मुखमण्डल तथा वाणी द्वारा व्यक्त होने वाले गहरे
दुःख से द्रवीभूत होकर, अथवा जो स्वाभाविक ही था, यह भय पाकर कि कहीं ऐसा
न होवे संकट बढ़े, उसने कहा कि मुझे मारते हो क्यों? क्या मेरी
हत्या करोगे? या कोई अमानुषिक हो? या कोई चोर या डाकू होवे? मुझे छोड़
दिया जावेगा ना?
एक क्षणमात्र के लिए उस न जाने क्या सोचा, तब तो उसने उस कठोर व
भारी छड़ी जिसको वह ले रहा था उस समय हाथ से फेंक ही दिया तथा अर्ध-
रुष्ट होकर तब वह उसे गाली निकालने के ही रूप में कुछ कहने लगा कि ? पागल-कुत्ते
क्या तेरी जान लेने और तुझे मार ही देने के लिये तुझे इस तरह पकड़ ले आवे कोई?
पागलपन तुझे सूझ रहा है क्या जो इस प्रकार के व्यर्थ बकवास करने लगता है? तुझे मारना
और इस तरह से मार कर फेंक ही देना होता, तो इतना कष्ट उठा कर
इतनी दूर क्यों लाते, ऐसा कहते? तू जानता भी है, कैसा मूर्ख?
"मुझको जो रूप में खड़ा किया गया है तो वह केवल इसके लिये?"
मुझे कैसा मूर्ख? क्या तू वास्तव में इतना मूर्ख? ऐसा प्रश्न किया? मूर्ख
कह दिया गया? मुझको इस बात का कोई प्रत्युत्तर मिलेगा?
इसके उत्तर रूप उसने कुछ नहीं कहा प्रत्युत केवल मुख से जो रोष तथा घृणा
का भाव इस प्रकार प्रकट हो रहा था वह सब तो यथावत ही रहा, फिर भी जो कुछ
अब तक उसने न कहा था सो कुछ प्रकट करना चाहा कि ? उसने जो कुछ कहा
सो सब तो व्यर्थ था? या उसने समझना ही नहीं चाहा जिससे कि कुछ बात का
प्रभाव ही पड़ सके न हो, प्रत्युत उस ओर से और भी अधिक घृणा ही प्रकट करने का
जो रूप तथा स्वभाव दिखलाया न जा सकता, प्रत्युत उसे केवल इसी बात का
भय मन तथा सिर पर उस दम सवार था जिससे कि वास्तविकता को समझना सब ही व्यर्थ
समझा जाने लगा?
उसने फिर कहा, "मुझे यहाँ तक लाये सब तो केवल दो बातों के लिये होगा"
उस बात के भाव को वह समझ सकता होगा क्या?
"मुझे मार कर फेंक देने या केवल दो बातों के लिये होगा"
इन दोनों बातों द्वारा उसने क्या कुछ प्रकट करना चाहा था, यह बात तो
स्पष्ट होकर सब कुछ प्रकट न हो सका क्योंकि उसने बहुत चाहा कि केवल दो बातों
पर ही ध्यान दिया जावे--एक तो यह कि मार, दूसरा यह कि, न मारा-जावे;
या केवल दो बातें स्पष्ट थीं कि जिससे जो कुछ स्पष्ट होता, सो सब कुछ है;
पर ऐसा समझना सब न हो कर उस व्यक्ति रूप से जो उपस्थित था सब कुछ
मार-पीट--सत्कार्य जैसा समझ लिया गया--सो उसके लिये सब ही परिणाम भया-
वह।
सब ही इस ओर लगा दिया था कि केवल दो बातों के रूप को छोड़ कर न तो
वह कुछ कह सका था, न स्पष्ट किया गया था कि जिस प्रकार दोनों बातों
अथवा एक बात का भाव प्रकट हो ही सकता था सो न होने देकर या समझने
दिया उस बात अथवा भाव रूप को नित्य-ही के लिये अप्रशस्त करने का निश्चय
कर ही लिया था केवल इसी रूप द्वारा सब बातों के रूप में देखा गया जाना सब
व्यर्थ समझा।
क्रोध ही केवल न दिखलाया गया; स्वभाव भी, कैसा था, इसका रूप यदि
उस दम देखा जाता तो उससे भी अधिक जो रूप उस समय प्रकट हुआ था, सो
यह कि, उस दम, प्रत्येक ने; केवल सिर को हिलाते हुए तथा मुंह को फेरते हुए
दोनों हाथ से एक संकेत रूपी चेष्टा प्रकट करके जो बात कही गई थी! उस
विषयक समस्त प्रभाव जिस रूप से उस स्थान में दिखलाई पड़ा था, उससे स्पष्ट
ही उस व्यक्ति न तो कुछ लाभ उठाया या देखा या उस समय उसका कोई रूप ही
ज्ञात व्यवहार के रूप में वह कर ही क्या सकता था ही क्या? फिर, सो सब
व्यर्थ गया था, केवल इस बात को छोड़ कर कि जो कुछ रूप या भाव उस
दम देखने में आया था, सो ऐसा बुरा प्रभाव उस पर छोड़ रहा था कि जो
कभी मिट नहीं सका, न उस प्रकार के रूप को कभी वह भूल ही सकता था
और सब कुछ था, सो सब कुछ व्यर्थ रहा या वह सब कुछ व्यर्थ था, इस बात का रूप
केवल दो बातों द्वारा देखना सब प्रकार व्यर्थ रूप प्रकट करने का रूप था? सब
प्रकार उस स्थान विशेष से सब ही मुख को फेर कर उस व्यक्ति विशेष,
जिसको भय से प्रत्येक अंग कांप रहा था उसके पास से हटना चाहा सो तो अवश्य
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