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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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इस प्रकार महाराज पृथु--द्वारा अभिनन्दित भगवान् ने भी प्रसन्न हो राजा को, जिनका
हृदय शुद्ध था।
अहो, राजा का भगवान् मधुसूदन और उनके भक्तों के प्रति कितना दृढ़ और अनन्य
प्रेम था! वे भगवान् सबके हृदय की बात जानने वाले हैं। अतः उन्होंने राजा के निष्कपट
प्रेम भाव को देख लिया और वे प्रसन्न हो गये। वे, जो सबके नियन्ता
"भगवान् ने कहा कि हे वीर, हे राजा ! मैं तुम्हारे इस यज्ञ से बहुत ही प्रसन्न हूँ--जिसमें
कि यज्ञ--कर्ता ने भी, अर्थात् तुमने भी अपने हृदय में मेरे प्रति अनन्य भक्ति भाव को ही
सब कुछ मान कर यज्ञ किया था।"
जो पुरुष इस प्रकार निष्काम भाव से यज्ञ करता है,
वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
जो लोग इस संसार में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--