Skip to content
SarvaKosh
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

Page 293 of 322

Read in context
Page 293

विचार करके ऐसा उपाय, साधन, पुरूषार्थ करो कि सर्व जगत मात्र सब कुछ छूट भी जावेगा
केवल अपने साथ सत्-स्वरूप आत्मा ही अमर सत्य रहेगा ऐसा मान, जानकर सब कुछ को
ही असार समझ कर इस सब का मोह त्याग करके ही रहो कि सब तो, कभी ना कभी सब कुछ
छूट ही जाना सब कुछ छूट ही रहा है। इसी बात का दृढ़ निश्चय करो, केवल एक ही अमर
सत्य, अखंड एक रसम् नित्य सुख स्वरूप सब काल तीनों कालों में, अपने रूप ही को, अपने
रूप स्वरूप--सच्चिदानन्द को विचारो।
केवल अपने सत्य-आत्म स्वरूप ही को! कि यह तीनों कालों काल में भी ना कभी
भी ना-होने वाला ही सदा रहेगा
सत्-स्वरूप ही विचार ही सब कुछ सब का आधार रूप, कल्याणकारी रूप सच्चा
स्वरूप? रूप सब का आधार रूप निज स्वरूप आत्म स्वरूप ही सदा सत्य असीम अविनाशी
ही अविनाशी का सब स्वरूप ही आधार रूप कल्याण का दाता स्वरूप कल्याण अविनाशी
स्वरूप ही को अपना स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता ही है। ना कि अन्य
कि संसार मिथ्या पदार्थों स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता हो यह सब मिथ्या
जगत को, संसार को, प्रपञ्चमय को, सब ही प्रपञ्चमय को अपना स्वरूप जानकर ना सत्य
समझ कर ना सत्य रूप मानो, सब नाश स्वरूप है।।
सत्-स्वरूप रूप केवल एक सच्चिदानन्द को अपना स्वरूप ही ना जानकर सब
प्रपञ्च स्वरूप ही को कल्याण रूप दाता सब ही का सब समझ कर प्रपञ्च स्वरूप ही
जगत् भ्रममय जगत को ही कल्याण सत्-स्वरूप स्वरूप ही सदा सत्य रूप समझकर
अपने ही स्वरूप को सत्य रूप सच्चिदानन्द को सब सत्य समझा? तो सब ही सत्य है,
कल्याण अविनाशी सब का सत्य सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब का ही ना मान करके
सदा सब कुछ को मिथ्या नाश रूप अविनाशी सब अविनाशी सब को ही सत्य
जाना ना, केवल अपने ही को अपना रूप ही सब संसार का सब कुछ ना ही जानकर
ना माना, प्रपञ्च ही माना।
अविनाशी स्वरूप ही को, अपना सत्य रूप ज्ञान ही अपना सत्य स्वरूप को,
सच्चिदानन्द--निज स्वरूप सब ही स्वरूप सब सब का सब ही अपना सब रूप सब
कल्याण ही सब कल्याण स्वरूप सब अविनाशी सब ही सब अपना ही कल्याण
सब कुछ निज स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही सब सब स्वरूप का आधार ही सत्य
सब अपना स्वरूप ज्ञान, ना अपना सच्चिदानन्द स्वरूप सब सब कल्याण का रूप ।
सब ही को अपना सच्चिदानन्द ही, ना माना सब कुछ ना ही सत्य है।।
ना सब ही अपना ना ही सब स्वरूप सब ही कल्याण स्वरूप निज स्वरूप
सब ही अपना रूप ही, ना स्वरूप ही कल्याण रूप स्वरूप, ना अपना ही,
अपना सब ही स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ज्ञान सब सब । ना अपना सत्-स्वरूप
कल्याण रूप ज्ञान । सब सब सब ही का सच्चिदानन्द स्वरूप ही सब अपना
कल्याण स्वरूप ही सब स्वरूप ही सब ही अपना सच्चिदानन्द ज्ञान ही सब का।
अपना रूप ही को, सब ही स्वरूप ही सब कल्याण रूप अपना स्वरूप
अपना ज्ञान ही सब का ही कल्याण सच्चिदानन्द ही ही ज्ञान ही ज्ञान सदा अखंड
स्वरूप ज्ञान सब का ही स्वरूप ही ही ज्ञान ही ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान ही
ही ज्ञान ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ही ज्ञान ही, कल्याण ज्ञान ही ज्ञान
कल्याण स्वरूप ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही, ज्ञान ही, ज्ञान ही,
ज्ञान ही, ज्ञान ही, ना ज्ञान ही ज्ञान सदा ज्ञान ही, स्वरूप ही सब ज्ञान रूप।
केवल ही ज्ञान सच्चिदानन्द ही ज्ञान ही ही ज्ञान स्वरूप।
अपना रूप, सब ही का स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ही स्वरूप ज्ञान
कल्याण स्वरूप, स्वरूप--ज्ञान ही स्वरूप ही स्वरूप सब ज्ञान सच्चिदानन्द स्वरूप
ज्ञान स्वरूप सब कल्याण ही कल्याण ही सच्चिदानन्द स्वरूप सब सच्चिदानन्द ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही; सच्चिदानन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान रूप,
सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान? सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान ही ही ही ज्ञान रूप ज्ञान
स्वरूप, ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान सब सब ज्ञान ही ज्ञान ज्ञान सच्चिदानन्द
ज्ञान सब सब सब ही सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब ही स्वरूप ही, सब कल्याण ही
स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान
ज्ञान ही सब ही ही सब ही ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान सब ही ज्ञान ज्ञान सब
ज्ञान सब सब ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान, ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही ज्ञान ज्ञान ही
सब ज्ञान--ज्ञान ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान
"सत्य-रूप ही ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप है।"
293