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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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विचार तो स्वावलम्बन का सर्वोत्तम या श्रेष्ठ उपाय तो यही होना ही चाहिये कि जिससे सब स्वावलम्बी
बनें? अब यह तो न महाराज का स्वावलम्बन हुआ तथा नहिं अन्य का स्वावलम्बन हुआ।
प्रत्येक व्यक्ति को ही स्वावलम्बी बनना योग्य ही है पर सब को तो एक
बार सब ही सब कुछ बना नहीं सकते तथा न ही सब अपनी बनाई ही वस्तु सब काम
में लावे इसी लिये तो सब व्यवहारों का जन्म हुआ।
स्वावलम्बी तो वही है, जिसने अपनी वस्तुएं बनाकर या मोल लेकर भी स्वयं ही
अपने उपयोग में ली हों। और साथ ही साथ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि उस
वस्तु का स्वरूप ही नष्ट, या वह उस प्रकार बनकर नष्ट होने योग्य न कहलाने लगे।
स्वावलम्बी तो प्रत्येक जन बन ही सकता यदि ईश्वर ने स्वाधीनता अपनी सब के
समान न बनाई होती। अब जब ईश्वर ने ही सब अपने नियन्त्रणाधीन ही रखा है, तो फिर
कोई किसी पर स्वावलम्बी क्या बने, या कह, या हो सके... सब का एक
नियन्ता ही सर्वेश्वर ही है, सो उसी स्वामी को सबका सब कुछ मानना चाहिये।
स्वावलम्बी होना जहां सर्वथा एक स्वाधीनता का नाम है, जिसका वास्तविक
तो यही है, स्वावलम्बी या स्ववश रहने का नाम है, जिसका दूसरा रूप, परवश
होना नहीं।
अतः सिद्ध हुआ, सब को तो एक समय सब जन ही सब वस्तु सब काम की
या सब प्रकार सुख दाता सामग्री को प्रस्तुत करने वाले तो न बनाकर या स्वयं
नहिं कर सकते अथवा अपने आप सब ही सब कुछ नहीं कर सकते इसीलिये एक
दूसरे पर आश्रित सब जन सब तरह सब जन एक दूसरे पर सब प्रकार निर्भर बन गये
जिस जन का जैसा काम किसी योग्य रहा वह उस काम को वैसा करता गया तथा
उस जन का वैसा प्रकार ही उस स्वावलम्बी का रूप बनकर परस्पर में सब काम
चला।
कहा भी न क्या किसी?
"चलते-चलते ही गिर पड़ा फिर भी नहिं सम्भल या उठ कर देख सका।"
इस सब का उत्तर यही निकला
"चलो, चलो, जहां तक चाल है या तो गिरो या फिर गिर कर स्वयं उठो फिर
चलो या जब गिर गये तब फिर माता-पिता का ध्यान करो।"
सो सब स्वावलम्बनियों का रूप एक जैसा सब समय सब प्रकार सब स्थानों पर
एक सा सब समय सब को नहीं मिल गया तथा नहिं मिल सका इसी लिये सब प्रकार
कोई जन किसी बात यथा रूप सम्भव ही नहिं रहा।
परस्पर में मिले स्वावलम्बी बनकर जिसने काम को तो अपने समय अनुसार
पूर्ण किया उसे सब प्रकार का सुख ही हुआ, पर जिसके सब स्वावलम्बी
न हुये या सब प्रकार स्वावलम्बी सब जन न बनकर कुछ अन्य पर ही आश्रित
ही हो गये, उसको सब काम कष्ट पूर्ण तथा विषम जन का काम देखना पड़ा।
पर क्या सब परस्पर के स्वावलम्बी जन सब ही काम को पूर्ण सुखमय या
सुखद बना सकते थे? जब कि न किसी का किसी प्रकार भी? स्वावलम्बी
कहा जा सकता था या स्वावलम्बी रूप तो स्वावलम्बी होकर केवल ही ही रह गया,
न किसी का रूप बदला अथवा बदला? तो परस्पर के स्वावलम्बी या तो
स्वावलम्बी कहला सके? अथवा सब किसी का सहारा चाहने लगे?
सो चलते-चलते गिर तो सब स्वावलम्बी व्यक्ति गये या अपना रूप खोया,
फिर भी स्वावलम्बी कहलाने लगे सो भी उचित था, फिर क्यों परस्पर
आश्रित बन कर स्वावलम्बी होकर सब स्वावलम्बी बनना चाहते थे? जिसका
परिणाम शून्य ही?
या सब जन ही स्वावलम्बी रूप हो ही गये, स्वावलम्बी सब स्वावलम्बी का रूप
परस्पर के रूप को बदलकर ही स्वावलम्बी बने, तो फिर स्वावलम्बन का नाम
केवल ही रूप तक सीमित क्यों रहा? फिर इस स्वावलम्बन विषयक चर्चा?
सब व्यर्थ समझी जा या मानी? स्वावलम्बन अपने आप सब स्वावलम्बियों का रूप
ही तो होगा या अन्य स्वावलम्बी जन से ही स्वावलम्बन का तो रूप बनेगा।
सब का सुख तो स्वावलम्बी बनने में था परस्पर एक दूसरे पर आश्रित
होकर स्वावलम्बी का रूप माना तो स्वावलम्बी नाम केवल रह गया पर काम नहीं,
सो काम करने पर ही व्यक्ति को काम का नाम देकर काम वाला कहा गया न कि
व्यक्ति नाम लेकर स्वावलम्बी बनता व काम, परस्पर काम में एक काम केवल ही
पर निर्भर रहा जाता था।
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