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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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हम चाहे जितनी भी प्रार्थना करें या तपस्या करें पर इसका फलित होना या अथवा मिलना तभी
संभव होता है, जब प्रार्थना हृदय की गहराइयों तक या तपस्या निष्काम भाव से की जाए।
जब हम समर्पित भाव अपनाते हैं तब हमारी हर बात ईश्वर तक पहुंचती है। प्रभु, यह तो
समर्पण देखना चाहते हैं। इस बात को एक दृष्टांत से इस प्रकार समझें।
एक नगर का यह नियम बना हुआ था कि वहां का राजा केवल पांच वर्ष के लिए बनाया
जाता था। पांच वर्ष राजा रहकर राज्य के सारे ऐश्वर्य भोगने के बाद उस राजा को उस राज्य की
सीमा के उस पार एक बहुत बड़े बीहड़ जंगल में छोड़ दिया जाता था। जहां
घूमते हुए वह राजा अपने अंतिम संस्कार पश्चात अपना जीवन समाप्त करता। इस प्रकार उस देश
में अनेक राजा आए, उन्होंने राज किया, सुख भोगे, पर अंत में सब वहीं पर छोड़ गए। यह
सोचकर कोई भी व्यक्ति उस नगर का राजा नहीं बनना चाहता था। क्योंकि अंततः मृत्यु-लोक जाने
पर अपना सर्वस्व-वैभव सब बिखर जाएगा।
"क्योंकि इस संसार रूपी जंगल में तो अपना कोई भी नहीं होता। जो केवल
सद्कर्मों द्वारा इस संसार में कर्म करता हुआ प्रभु भक्ति करता है वही इस भवसागर से पार उतरता
है, तथा इस पार संसार का सुख-चैन तो विनाशीय पदार्थ मात्र है।"
अंततः एक, दो व्यक्तियों द्वारा आग्रह करने पर एक व्यक्ति ने उस राज्य का राजत्व स्वीकार
कर लिया। नियमानुसार वह सिंहासन पर बैठ गया। उसने उन पांच वर्षों में राज्य का सारा
वैभव भोगा तथा अपने राज्य को विकसित करते हुए एक अत्यंत सुंदर नगर की रचना की, उस
जंगल में जो उस नगर के पार था। उसने वहां पर सुंदर-सुंदर महल, बाग-बगीचे बनवाए।
चारदीवारी का निर्माण करवाया, उस बीहड़ को एक अत्यंत सुंदर और हरा-भरा व सुरक्षित
स्थान बना दिया। पांच वर्ष पूरे हो जाने पर, नए राजा द्वारा विदाईस्वरूप दी गई
विशाल नौका में बैठकर वह उस पार पहुंच गया और अपने बसाए उस नए सुंदर राज्य में सुख
पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
क्या ऐसा कोई व्यक्ति था वह? नहीं! कोई भी नहीं। केवल कथा रूपी इस संसार में ही
सत्य को जान सका! पर सत्य है कि हम सब भी इस संसार में पांच वर्ष के लिए आए
हैं। हम सब कुछ जानते हुए भी इस बीहड़ जंगल रूपी जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ईश्वर
द्वारा दिए गए इस शरीर को जो एक नश्वर वस्त्र की तरह है जिसे एक दिन छोड़ना ही
पड़ेगा। इसके पश्चात हम सब भी उस पार के उस भव-सागर में उतर कर उस बीहड़
जंगल में चले जाएंगे! सत्य यही रहेगा!
उस बीहड़ जंगल में अपना कोई भी नहीं है। वहां केवल प्रभु की भक्ति रूपी,
सत्य निष्ठा रूपी नौका ही इस भवसागर को पार कराने में सहायक बनेगी। यह संसार तो
सराय रूपी है। हम सब यात्री इस सराय में थोड़े दिन रुकेंगे और फिर चल देंगे, इसलिए
जिस प्रकार उस राजा ने अपनी समझ से उस पार की चिंता की, वैसे ही हमें भी
उस बीहड़ संसार की चिंता करनी चाहिए जहां सब कुछ छोड़ कर जाना ही है,
जिसे पारलौकिक सुख कहते हैं? इसलिए हे मानव! प्रभु के आगे अपनी प्रार्थना समर्पित
करके देख, जो कुछ भी तूने कमाया है उसे प्रभु को सौंप दे, यह समझ कर कि
सब कुछ प्रभु का ही है। इस समर्पण भाव से तू इस संसार से पार उतर
जाएगा। जो प्रभु का होकर रहेगा, पारलौकिक सुख को पाकर ईश्वर भक्ति रूपी
सुख में मगन होकर, प्रभु के धाम में स्थान पाएगा। जो समर्पित भाव से कर्म करेगा
उसे इस जन्म में शांति, और मृत्यु के उपरांत प्रभु का सामीप्य अवश्य प्राप्त होगा, बस! तू
निर्मल मन से कह, हे प्रभु! मैं तेरा और तू मेरा? तू ही मेरा पालनहार है?
यह प्रार्थना भाव मन में धारण करके जब तू अपनी निष्काम भक्ति रूपी
साधना करेगा, तो ईश्वर की कृपा क्यों नहीं बरसेगी?
ईश्वर को जानने की नहीं, भाव से मानने की वस्तु है।
यह संसार भले ही कितना भी विशाल हो परंतु जब हम मन को एकाग्र करके, इस
परम तत्व को जानने बैठेंगे? तब हमें ज्ञात होगा कि संसार में ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि
का बहुत बड़ा क्षेत्र है। यह सब कुछ जान लेने पर भी जब हम शांति को खोजेंगे, तब-
तब हमारे मन में ईश्वर के प्रति एक तीव्र प्यास जगेगी, व यही प्यास संसार
के सब सुख-साधनों से परे होकर हमें, उस परम चेतना की ओर ले जाएगी।
सांसारिक सुख-भोगों का अंततः नाश होगा, पर ईश्वर शाश्वत है, यह बात समझ
कर, हम ईश्वर शरणागत हो जाएंगे।
उठो! जागो, जाग्रत बनो, इस मन, बुद्धि, इंद्रियों को, अहंकार को, काम को,
क्रोध को प्रभु के चरणों में समर्पित कर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाओ। आओ,
सब मिलकर, एक होकर, निष्काम भाव से ईश्वर के चरणों में वंदन करते हुए, उनकी स्तुति गाएं।
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