Skip to content
SarvaKosh
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

Page 228 of 322

Read in context
Page 228

समाज का रूप चाहे जैसा बने, मनुष्य अपने मूल रूपमें कभी नहीं बदल सकता कि वह
पशुताका आधार ग्रहण करे, अथवा वह स्वयं ही पशु हो जाय। माता-पिता और पत्नी, भाई
और बहन का सम्बंध क्या यह संसार मिटानेका प्रयत्न भी कर रहा होगा, यह मैं नहीं मानता।
यह तो एक सामाजिक ढांचा भर है। इन पर भी जब समाजके रूपमें गहरा आघात
पहुंचे तो लोग या स्वयं मर जाते हैं या फिर अपनी सुरक्षा करने के लिये दूसरों को मारते हैं।
मनुष्य का यही तो वह मूल आधार स्वभाव है। यह मिटा नहीं कि वह स्वयं मिटा और जब तक
वह मिट नहीं सकता, तो यह भी मिट नहीं सकता।
कभी आपने सोचा कि दुर्बलता क्या है? कभी इसका विचार किया है? कभी इस
विषय पर भी कुछ सोचा समझा? दुर्बलता तो निर्बलताके अतिरिक्त शारीरिक तौर कही
नहीं जा सकती। जो तो शारीरिक या अन्य किसी भौतिक रूपमें बलवान् नहीं उसका तो बल
समाप्त हो गया और दुर्बल एक असाध्य रोगके समान ही समाज में रहकर अपना जीवन
बिताता ही नहीं वरन् जीवन भार बन जाता है न! इससे तो अच्छा? स्वयं ही समझो? यही सब सोच,
समझकर, क्या यह उचित? कि किसी व्यक्ति को जो निर्बल और असहाय हो इस तरह छोड़
न दिया जाय जिससे वह, न जाने किसपर भी भार बन जाय।
समाज मनुष्य के लिये जिस तरह बनता उसी तरह मनुष्य भी समाज का पोषण और
रूप इस तरह बनाकर ही रख सकता, जिसे समाज ही कहा जाय? ऐसा ही
करना उचित भी? समाज का स्वरूप तो प्रत्येक रूपमें एक ऐसा रूप बनता
जिसमें न भय का स्थान, न भय देनेवाले, न भय पानेवाले रूपकी ही आवश्यकता
होती जिसका कि आधार मात्र प्यार, सेवा और त्याग, सहानुभूति आदि गुणों के अतिरिक्त
अन्य तो उसका रूप ही नहीं बनता और, जो रूप इस तरह न बनाया जा सके, वह तो
फिर एक परस्परकी शत्रुताका ही रूप तो माना जाय, जो विरोधी के रूपमें खड़ा
रहकर भी भयभीत होकर सब कुछ करता हो और ऐसा समाज तो एक न एक दिन
नष्ट होना ही।
आवश्यकता इस बात की तो तब जान पड़े जब समाज का विनाश हो, या
समाप्त ही कर दिया जाय या फिर इस पर आश्रित रूप ही न रहने दिया जाय।
न तब ऐसा अवसर भी बार बार आया करेगा! तब क्यों न इस बात पर विचार करके
समाज का ही सहारा त्याग दिया जाय। तब समाज अपने आप ही बन-मिट न कर
सदा अपने ही रूप बना ले और, उस समय भी तो सब कुछ वैसा ही बन जाय, जो
कि सब लोग आपस में एक दूसरे को मारें! विनाश तो तब भी समाज व्यक्तियों का
होगा ही, जिसे वर्तमान समाज कहा जा रहा उसी के द्वारा भी।
इसके लिये उपाय ही क्या किया जाय? जिसे केवल एक भय ही मात्र कहा
जाय, उसको तो दूर किया जाय? या फिर जिसके आधारपर समाज बंधा हुआ कहा
जाता? उस सारे वातावरण-को ही ऐसा बनाया जाय जिससे भय तो दूर ही भाग
जाय, तो फिर इसका फल तो सब को भोग ही पड़ेगा।
निर्बलता तो तब तक बनी ही रहेगी जब तक मनुष्य का रूप इस
प्रकार बदला नहीं बन जाता कि समाज उसे किसी प्रकार भी भयभीत न करे।
यह सब कैसे हो?
दुर्बलता क्या, या फिर इसका स्वरूप क्या? यह किसी का अपना कोई
स्वरूप? या फिर जब कभी सब अपने भय को ही त्याग बैठते हैं, तो ही दूसरा
उन पर अपना भय जमा लेता अथवा स्वयं दूसरा भयभीत हो कर आतंकित
रूप धारण कर लेता कहलाने का यत्न भी न कर पाता। इसका अर्थ तो यह हुआ,
भय का रूप जब व्यक्तियोंमें आया, तो इसका त्याग कोई एक ही तो नहीं करेगा और
न किया जा रहा है। भय निवारणार्थ रूप न बनने, सब को निर्भय हो इस
वातावरण को भी नष्ट करनेके लिये न तो कोई आगे आ रहा है न इस प्रकार
निर्भय बना सकेगा?
जो लोग समाजमें रहकर भी इस तरहके विचार व्यक्त करते हैं वे समाजके सम्बंधमें
कुछ नहीं जानते कि समाज का आधार ही भय और प्रेम दोनों के ऊपर ही स्थिर
रहता है। न तो भयके, न ही प्रेम मात्रके बलपर समाज की स्थिति रह सकती,
बल्कि दोनों, के एक दूसरे के सम्बंधसे ही समाज का स्वरूप इस प्रकार बना
रहना सदा सम्भव रहा।
"जो केवल भयके आधारपर समाज बनता है, केवल ही प्रेम मात्रपर समाज बनता"
इस बातको इतिहास के पृष्ठ मात्र ही सत्य सिद्ध
कर रहे हैं। ऐसा न कर समाज का संतुलन बिगड़
228