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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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भगवान्‌ का रूप ध्यान करनेपर ही चित्त से सर्वप्रकारके विषय हटकर चित्त एकाग्र
होकर स्थिर हो तब यह ही समझना चाहिये कि, इस भगवान्‌ के स्वरूप चिन्तनके द्वारा वह उस
ही परमात्मपद प्राप्त होगा, न केवल विषय सम्बन्धी चिन्तन ही परमात्मा की प्राप्ति का
प्रतिबन्धक रूप महा विघ्नस्वरूप समझ पड़ता है किन्तु उस परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन
भी भगवान्‌ स्वरूप प्राप्ति का बड़ा कारण समझता हुआ कोई यदि इस बात का ध्यान करता रहे कि अमुक
रूप परमात्मा केवल चिन्मय ही है।
राजा कहते हैं, "केवल चिन्मयभाव केवल निर्गुण का स्वरूप, किसी प्रकार का
संकल्परहित ही, भगवान्‌ का साक्षात्कार करानेवाला है।"
जब तक मनमें रूप सम्बन्धी विचार बना ही हुआ है, तब तक केवल, निर्गुण का ध्यान,
जहाँ नाम, रूप आदि, का सर्वथा अभाव; हो उस जगह ध्यान, करने वाला पुरुष चित्त में केवल
निर्गुण का ध्यान रख कर ही उस पद को प्राप्त करे, नकि रूप का ध्यान करते हुए उस जगह तक
पहुँचना चाहे वह कभी नहीं पहुँच सकता है। इसलिये हे राजन्‌! उस रूप का ध्यान केवल
उस रूप स्वरूप के ध्यानका साहाय्यक हो रहा है न केवल, उसके द्वारा प्राप्त होने वाला निर्गुण
का रूप उस केवल ध्यान साध्य रूप ही समझता हुआ, जो जीवात्मा ध्यान करता जा रहा
है, क्या वह उस रूप ध्यान द्वारा कभी भी केवल परमात्मा का रूप प्राप्त कर सकेगा? क्या
उस स्वरूप का ध्यान छोड़? उस जगह केवल, रूप रहित होकर, ध्यान का ध्यान करने
का रूप प्राप्त करेगा? उस रूप को छोड़कर ही केवल स्वरूपका ही ध्यान?
राजा ने कहा कि इस प्रकार केवल, रूप से भिन्न जो केवल रूप है उस रूप
रूप का ध्यान ही तो सब प्रकारके साध्य रूप केवल ध्यान का विषय हो सकता है।
तब तो फिर इस रूप का रूप क्या रह गया! स्वरूप का तो जो ध्यान हो रहा है
केवल रूप के ही ध्यान द्वारा सब कुछ
जब इस ही रूपके ही द्वारा उस केवल का रूप ध्यान में आ गया तो फिर भी, यह
निराकार रूप ध्यान ही सब कुछ रूप का रूप कहा गया, तब फिर तो यह ही
समझना चाहिये केवल साकारका ही स्वरूप सब तरहसे केवल रूपके समान
ही सब तरह उपयोगी हो तो फिर इस प्रकारका रूप जो कहा गया है, साकार का
ध्यान केवल ही सोपान रूप
रूप के ध्यानमें सब कुछ ही केवल का रूप केवल के ही समान सिद्ध हो रहा
ही कहा गया है। केवल के, सब प्रकार ध्यान रूप में, एक ही बात तो नहीं कही
गई, जिस रूप द्वारा केवल का स्वरूप मात्र सिद्ध होगा, उस रूप का ध्यान करने
पर केवल प्राप्त होगा? केवल ध्यान ही सब कुछ? तो फिर क्यों, इस प्रकार
कहा गया
यह बात सुन कर राजा से कहा गया, हे राजन सुनो रूपका? जब ध्यान
किया गया, तो वह "रूप" रहा, या वह केवल रूपी कहलाया? रूप केवल रूप का रूप
सब तरहसे केवल मात्र रहा, उसी प्रकार रूपी मात्र ध्यान रूपी रहा, तब तो वह रूप,
रूप ही रूपमें उस ही रूप द्वारा साक्षात्कार के योग्य रूप हो गया। यह रूपी
रूप ही केवल मात्र रूप को लिए हुए केवल मात्र रूप ही रहा, तो फिर केवल
रूप मात्र ही कहा गया
सब प्रकार का ध्यान रूप भगवान्‌ का केवल ही तो घट-पट आदि रूप तो
कहा नहीं है; सो यह ध्यान मात्र केवल ही तो रूप कहा गया है। यह सब
प्रकार का ही है, सो इस रूप केवल ही के सब रूप मात्र रूप सब कुछ ध्यान रूप
केवल के ही ध्यान द्वारा सब ही केवल के ध्यान के योग्य रहा
सब तरह का ध्यान भगवान्‌ का ही तो केवल सब प्रकार सिद्ध होता हुआ सब
तरह का रूप सब प्रकार से सब रूप ध्यान रूप हो जाने वाला सिद्ध रूप हो रहा
है। यह सब प्रकार का रूप सब प्रकार भगवान्‌ का ध्यान ही एकमात्र सब प्रकार
सब ही रूप से सब तरह सब जगह केवल रूप आत्म-साक्षात्कार रूप में प्राप्त होने
वाला है ही, जिसके द्वारा ही तो भगवान्‌ का साक्षात्कार हो रहा भगवान्‌
नारायण, नित्य रूप! इस परमात्मा के स्वरूप रूप का ध्यान करने का सब रूप
यह ही, केवल के ध्यान का सब तरह रूप बन गया, तो उस ध्यान का रूप केवल
ही रहा, केवल ध्यान रूप केवल ध्यान रूप ही सब प्रकार ध्यान रूप में केवल
ही रहा। तब केवल केवल ही रूप बन गया। इस प्रकार हे राजन्‌, केवल ध्यान
मात्र ही रहा! भगवान्‌ सदा सब रूप सिद्ध रूप केवल ही तो केवल ध्यान
मात्र केवल रूप ही सब... का रूप ही, भगवान्‌ का केवल ध्यान सब तरह
ही तो केवल का ही केवल मात्र रूप केवल केवल केवल रूप सब केवल ही तो
रहा
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