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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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प्रार्थना का फल, उपासना का महत्त्व, या उस परम चेतन शक्ति स्वरूप प्रभु कृपा, या
सर्वव्यापक का ध्यान सब समय हमारे साथ लगा रहना चाहिए, केवल संध्या उपासना समय ही नहीं
वरन् हर समय हमारे हृदय में यह ध्यान बना न रहे, तो हम पाप कर्मों में प्रवृत्त हो
ही नहीं सकते या दुर्गुणों का हम शिकार हो सकते हैं? भला कोई भी जीव इस प्रकार
चाहता न हो, तो वह उस ईश्वर की सर्वज्ञता का ज्ञान हर क्षण क्यों नहीं रखेगा?
भगवान् को सर्वज्ञ कह, उसकी ही निन्दा; यह बात भी हमारी ही, मनुष्य ही
अज्ञानतावश हो जाया करती है। परन्तु जब हम उस प्रभु को सर्वज्ञाता मान लेते हैं,
उसकी ही शरण में हर समय ही इस बात का ध्यान बना रहे अर्थात् हर क्षण में ईश्वर का भय
ही बना रह सकता, तो कदाचित् मनुष्य का पतन नहीं
हो ही सकता। यह अज्ञानतावश ऐसा विचार, जो प्रभु को उपासना ही तक सीमित
मान लिया जाता, या केवल पूजा समय ही पर उसका महत्त्व समझा जाता! वास्तव में ऐसा
ही मनुष्य अज्ञानी ही तो है। जो केवल एकान्त में ही प्रभु को, उस के भय का नाम लेवे
या प्रभुता स्मरण करके बैठ जाय, या केवल मन्दिर या मस्जिद में ही प्रभु को स्मरण,
सर्वव्यापक को उस रूप में मान कर अपना काम समाप्त समझे, ईश्वर को सर्वव्यापक मान लेने
वाला कभी भी इस रूप में ईश्वर को सर्वव्यापक समझ, या मान कर अपने को सर्वव्यापक प्रभु रूप
मान कर ऐसा नहीं कर बैठता। वरन् ईश्वर तो सर्वत्र है ही। इसलिए सर्वव्यापक का भाव
परमात्मा समझने वाले को हर समय हर पल प्रभु स्मरण ही रहना चाहिए।
फिर जो ईश्वर की, या सर्वज्ञ प्रभु के लिए अपनी इच्छा अनुसार फल या परिणाम चाहे,
मनुष्य विचार करने लगता अथवा ईश्वर की कृपा पर अपनी इच्छानुसार कोई फल चाहता है।
ईश्वर कृपा, फल या कृपा रूप फल का भाव यही है, मनुष्य अपनी भावना प्रभु के अर्पण
कर सब कुछ, परमात्मा के ध्यान में रख कर चले, ईश्वर के स्वरूप ज्ञान का सही मार्ग यही
सिद्ध होगा। सो, यदि! ईश्वर कृपा परिणाम स्वरूप ही मनुष्य समझे तब तो ईश्वर कृपा
रूप का ज्ञान, या उस का स्वरूप प्रभु के ध्यान में लगाना बहुत कठिन होगा।
फिर बात केवल ईश्वर उपासना की दृष्टि से ही विचार की न रह जाय, वरन् यह
तो मनुष्य के जीवन का लक्ष्य ही बन जाना ही सत्य का रूप और मनुष्य का धर्म या कर्त्तव्य
सिद्ध होवे। तब यह बात स्पष्ट रूप से अपने आप ही मानव कल्याण-मार्गदर्शक बन कर उस के
हर कार्य रूप में आ जायेगी।
मानव और प्रकृति केवल दो ही तो नाम इस जगत् में सृष्टि के हैं। यह जगत्
इन दोनों अवस्थाओं स्वरूप माना गया है। अतः, प्रकृति से मनुष्य जब अलग हो अपने
को एक न समझ कर या दोनों अलग-अलग को केवल भोगने वाला मनुष्य मान बैठेगा, अर्थात्
प्रकृति को भोग मात्र ही का साधन मान कर मनुष्य अपने सुख के साधन ही को केवल मात्र
प्रकृति का रूप मानेगा तो ऐसा भाव मनुष्य प्रकृति से अलग हो कर ही अपने आप समझेगा।
पर जब सत्य भाव यह है कि मानव रूप और प्रकृति दोनों का एक ही सम्बन्ध है। जब
तक यह सम्बन्ध मनुष्य समझता रहेगा; मानव जीवन सफल होता रहेगा। हाँ, यदि प्रकृति
स्वरूप रूप को वह भोग मात्र ही का साधन समझे बैठा तब वह अपना सर्वनाश स्वयं
ही कर लेगा, प्रकृति का कुछ न बिगड़ेगा।
यह अवश्य कहा जा सकता होगा कि, सर्वव्यापक शक्ति स्वरूप प्रभु तो
सर्वव्यापक रूप होकर सब का सब कुछ कर्ताधर्ता सब कुछ करने वाला ही कहा गया, तो
वह मानव स्वयं कुछ कर सकनेवाला अथवा कर्त्ता क्यों न हो? ईश्वर की सर्वज्ञता तो प्रत्येक
रूप में या हर समय व्याप्त है। तब फिर ईश्वर शक्ति केवल साक्षी, प्रकृति केवल
भोग रूप मात्र क्या रह ही गयी, प्रकृति मनुष्य को भोगने के लिए ही क्यों उपयोगी की
गयी है?
यह प्रकृति उस सर्वशक्ति स्वरूप की शक्ति का प्रतीक ही समझ कर, उस द्वारा
सर्वव्यापक का यह आभास रूप में सर्वव्यापक ज्ञान प्राप्त किया जाना सम्भव हो सका।
केवल भोग मात्र समझ कर अज्ञानता ही तो है! ऐसा क्यों? प्रकृति को केवल उपभोग्य
समझकर भोग के ही लिए केवल साधन क्यों माना? भोग्य साधन क्यों? प्रभु की सर्वव्यापक
रूप का सच्चा स्वरूप समझ, प्रकृति का महत्त्व ही ईश्वर का महत्त्व होगा?
इस प्रकार जब मानव समझेगा, तब ईश्वर की प्रभुता को जान कर, उसकी सर्वव्यापक
या शक्ति स्वरूप समझ कर ईश्वर की ओर अपने कदम को बढ़ा, ईश्वर स्वरूप साक्षात्कार
कर सकेगा। तब मानव सर्वव्यापक ही का सब रूप जान कर जीवन चक्र के रहस्य ज्ञान प्राप्त
करेगा। हाँ, सर्वव्यापक ईश्वर अपने सर्वव्यापक रूप स्वरूप साक्षात्कार स्थिति में प्रभुता
का ज्ञान करा देगा, सर्वज्ञता समझकर प्रत्येक स्थिति को वह प्रभु ज्ञान रूप समझेगा।
इस से मानव प्रभु की ही सर्वव्यापकता को समझने का प्रयास करता रहेगा।
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