एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
Page 203 of 322
Read in contextसाक्षात्कार करना पड़े तो उस परमात्मा रूप का रूप और नाम धारण कर मनुष्य संसार करेगा और
अपने सब काम छोड़कर सब जगह उन के ही पीछे पीछे फिरेगा जिससे सारा संसार विनाश को
प्राप्त होजायगा न्याय भी परमेश्वर का जाता रहे, कारण सब काम न हो सकें किन्तु ऐसा कभी
विचार नहीं हुआ
देखो जो ऐसा कहे, कोई राजा अपने--राज्य सम्बन्धी सब प्रबन्ध
अपनी सारी प्रजाके सिर पर छोड़े अर्थात् जैसाकि वह जो चाहेगा सो करेगा इसमें
राजा प्रजा को स्वाधीनता देकर आप तो सब प्रकार अलग बैठा हो उस को मूर्ख कहेंगे, ऐसा कभी
नहीं! परमेश्वर सबको अपने हाथ बाँधके स्वाधीन छोड़ दे उसके हाथ नहीं; ऐसा नहीं है,
वह सर्वशक्ति मन्त्र रखता है जो उस स्वाधीनता द्वारा संसारके जीवों को देखता है, राजा
संसारके को देख नहीं सक्ता सो लाचार, इस बात विषे नहीं कहा
दूसरा दृष्टान्त, जैसा कि किसी एक अनाथ बालकको विद्या का तन-मनसे दो
विद्या पढ़े सो--विद्या अभ्यास का फल पायेगा सो अभ्यासी सब तरह सुखी और जो
विद्याहीन रहे सो तन मन धन से दुःखी और सब जन उसका तिरस्कार करें सो वह अपने कर्मका
फल भोगे इस में उस अनाथ बालकके पालनेवाले का तो दोष नहीं, हां! जो परमात्मा संसारके
बालकोंको सब प्रकार विद्या बुद्धि दे के सब प्रकार सुख दाता और रक्षक है, सो सर्वशक्ति का
सुख जो कोई भोगे, पावेगा व पावे
भला ऐसा कहो, कि जो परमात्मा निर्दोष न्याय कर्त्ता, जो है, उसका रूपक जो
संसार रूपी चक्र है सो उस चक्र का इस चक्र द्वारा सब सब प्राणियोंको फल भोग
कराने का सब उपाय बनाया
उस रचना रूपी चक्र के फेर से, अपने आप सिद्ध हुआ! दूसरा जो ऐसा कहे कि
ईश्वर सब रूप सब काल रूपी चक्र से बना है, उसका अर्थ यह होगा
परमात्मा का स्वरूप वा परमात्मा का शक्तिभाव जो उस द्वारा उत्पन्न वा नाश
का रूप हो कर सर्वशक्ति का रूप हो रहा है उस सर्वशक्ति रूप में वह सब जगत् रूप
रूप होकर ही उस परमात्मा का रूप बना है उस रूप को सब जानते हैं॥
इति प्रथम प्रश्न
203