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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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श्री भागवत सुधा
अष्टमोऽध्यायः जारी...
गज द्वारा प्रभु स्तुति

श्लोक 24
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
अन्वय एवं साधारण शब्दार्थ
ॐ नमो भगवते तस्मै (उस भगवान् को नमस्कार है)
यतः एतत् चिदात्मकम् (जिससे यह सारा जगत् चेतनामय है)
पुरुषायादिबीजाय (जो सबके आदि कारण पुरुष हैं)
परेशाय अभिधीमहि (उस परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं)
हम उस परम पुरुष "ब्रह्म" रूपी ईश्वर का ध्यान करते हैं।

श्लोक 25
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥
अन्वय एवं साधारण शब्दार्थ
यस्मिन् इदम् (जिस परमात्मा में यह जगत् स्थित रहता है)
यतः च इदम् (जिससे यह उत्पन्न हुआ है)
येन इदम् (जिसके द्वारा इस जगत् की रचना हुई है)
यः इदं स्वयम् (जो स्वयं इस संसार रूप में प्रकट होता है)
यः परस्मात् (जो प्रकृति से परे है)
च अस्मात् परः (और जीवात्मा से भी श्रेष्ठ है)
तम् स्वयम्भुवम् (उस "स्वयंभू" परमात्मा की) प्रपद्ये (मैं शरण लेता हूँ)

पहला प्रमाण यह दिया गया जिसे सब एक मत से सही मानते हैं कि जो यह जगत्
व्यक्त दिख रहा है, इसका लय किसमें होता है?
परमेश्वर ब्रह्मस्वरूप परमात्मा में। लय होने पर उसकी स्थिति कैसी हो जाती है?
अन्धकारमय जगत् का नाश करके जैसे सूर्योदय से पूर्व का समय हो जाता है। प्रकाश
नहीं रहता, केवल अन्धकार रहता है। इस अविद्या-तम से ऊपर जो ब्रह्म ज्योति
स्वरूप है, वह प्रकाश रूप ईश्वर ही है; जो इस अन्धकार से परे है। उसका अनुभव केवल
ज्ञानी
करते हैं और वही इस जगत की रचना करता है।
एक बात यह स्पष्ट हो जाती है कि यह जीव अनेक प्रकार के देवी-देवता आदि
के प्रति अपनी आसक्ति भाव रखता है, किसी से अपनी रक्षा के लिए आशा लगाए
रखता है, लेकिन इनमें से कोई भी समर्थ नहीं है। इस बात को गजराज ने भली
भांति जान लिया था, क्योंकि जब ग्राह ने उसे पकड़ा तो उसके परिवार के सभी
लोग उसे छोड़कर चले गये। वे सब अपनी रक्षा में लगे थे, लेकिन कोई भी इस
संकट से गजराज की रक्षा करने में सक्षम न था।
अन्ततः जब गजेन्द्र ने अपनी बुद्धि से निर्णय लिया कि इस लोक में कोई भी
उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं है तो उसने विचार किया कि कौन है जो इस ग्राह से
छुड़ा सकता है? फिर उसे पिछले जन्म की स्मृति जाग्रत हुई। उसने सोचा कि ऐसा
कोई तो है जो इस संसार में सबसे श्रेष्ठ है, सर्वव्यापी है और सबका साक्षी है।
वह परमेश्वर कैसा है? उसके रूप को कोई नहीं जानता। वह कैसा है? वह
निराकार है या साकार है? उसके प्रभाव को कौन जान सकता है? जिसने इस
संसार की रचना की है। वह इस जगत का प्रकाशक है। वह सर्वव्यापी है।
उसी को मैं नमन करता हूँ।
जिस प्रकार नाटक के विभिन्न रूपों को केवल कुशल अभिनेता ही समझ
सकता है, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर को केवल ब्रह्मज्ञानी ही जान सकते हैं।
वही इस अखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी है। वह अजन्मा और अपनी शक्ति से लीला-प्रसार करता
है। वह अपनी शक्ति-माया से लीला करता है। उस असीम शक्ति के आगे मैं नतमस्तक हूँ।
मैं गजराज हूँ, इस संकट से मुझे वही प्रभु उबार सकते हैं। इसलिए मैं उनकी
शरण में जाता हूँ।

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