एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextप्रत्येक वस्तु अपने मूल को छोड़ती नहीं उसकी जड़ पेड़ को छोड़ देती है। यह सर्व धर्म का नियम है।
दार्शनिक विचारक रूप से सब अपने जीवन सत्य से विलग हो रहे हैं। मनुष्य कितना भी धन
कमाले, मकान या महल या तिजोरी का मुंह कितना बड़ा या छोटा हो लेकिन आत्मिक शान्ति-
के दो, दो बात अपने बच्चों से बोलना वह भूलता
जाता है। मनुष्य रूपी यह पेड़ जब जड़ों रूपी बच्चों से दूर हो रहा है। इसके लिए
सब एक ही बात स्वीकारते नजर आते हैं, मनुष्य अब अपने मूल को भूल
कर भौतिक रूप में ही जीवन की सार्थकता देख रहा है। वह परिवार रूप में
परिवार को भूल गया। मनुष्य के भीतर जो अमृत था वह विष रूप में परिवर्तित
हो गया, मनुष्य जब तक अपने को इस जहर से मुक्त नहीं करेगा तब तक
वह न तो शांत रह सकता और न ही परिवार को संस्कारित कर सकता
है। वह, परिवार का नाम लेते ही यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि परिवार से ही
सब कुछ होता तो फिर लोग अपने परिवार को छोड़कर बाहर क्यों जाते?
तब तो सब अपने घर में रहकर ही सब कुछ पा लेते। लेकिन यह सच नहीं
है, जब तक-परिवार को सही दिशा नहीं मिलेगी तब तक मनुष्य का
मन शांत नहीं होगा।
यह बात सत्य अवश्य माननी पड़ेगी कि परिवार ही मनुष्य का पहला स्कूल है,
लेकिन मां, बाप, भाई, बहिन के रिश्तों को समझने का माध्यम भी तो होना ही
चाहिए। इसके लिए सब से पहले मां, बाप अपने को संस्कारित करें ताकि बच्चों
को भी यह सब नजर आ सके। मनुष्य जब तक खुद को इस बात के लिए तैयार-
नहीं करेगा तब तक इस समस्या का हल होना मुश्किल नजर आ रहा है।
इस पर सब चुप थे, इसलिए उन्होंने फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते
हुए कहा कि मनुष्य को यह समझना ही पड़ेगा कि उसके पास जो कुछ बचा
है उसे वह संभाल कर रखे। भौतिक सुख मनुष्य को कभी भी संतुष्ट नहीं
कर सकते।
मनुष्य का स्वभाव भी विस्मृत सा रहता है। वह सुख-दुःख की बात तो
बहुत करता दिखाई देता है लेकिन वह मन-बुद्धि, चित्त को नहीं
समझ पाता। मन के पार जाने की, बात वह करता तो है, लेकिन मन के पार तो
सुख-दुख दोनों एक हो जाते हैं। मनुष्य सुख चाहता है लेकिन उसके लिए
शांत, एकाग्र और निर्विकल्प होना जरूरी है। इस बात की शिक्षा मनुष्य
को घर से ही मिल सकती है। मनुष्य यदि अपनी दृष्टि को स्थिर कर ले, तो वह
सत्य को देख सकता है। सत्य को जानने के लिए, मनुष्य के पास विवेक दृष्टि
होना जरूरी है।
मनुष्य के स्वभाव के पीछे--जो शक्ति छिपी हुई है वह अनासक्ति भाव से परि-
पूर्ण है, और इस भाव को जगाए बिना मनुष्य का जीवन सफल कैसे हो
सकता है? मनुष्य अपने-आप सवाल करता है कि क्या कारण है, कि मैं सब कुछ पा
कर भी संतुष्ट नहीं हो पाता? संतुष्टि कहां है? मनुष्य बहुत दुखी है!
उसका अंतःकरण मथ रहा है। उसे अपने को जानना होगा। उसके
लिए यह जरूरी है कि वह अपनी चेतना को जागृत करे, जो उसकी आत्मा
को शांति प्रदान करेगी।
जब तक वह अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ज्ञान को नहीं समझेगा
तब तक उसे सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता। मनुष्य को यदि अपने
को समझना है, तो अपनी वृत्तियों को वश में रखना होगा। अपने शरीर में
जो प्राण है उसकी गति को साधना होगा, तभी परमात्मा का ज्ञान
संभव है।
आज मनुष्य मन को न समझकर केवल बुद्धि की बात करता
है। बुद्धि तो सांसारिक सुख की ओर ही ले जाती है। बुद्धि से मन
कभी शांत नहीं हो सकता, वह केवल विषय वासनाओं की प्यास बढ़ाती
जाती है। बुद्धि मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाती है। यदि मनुष्य
इस पर विजय प्राप्त कर ले तो अपने जीवन को सफल बना सकता है।
जीवन को परमात्मा रूप समझकर जब मनुष्य जीने लगेगा, तभी
वह अपने आप को समझ पाएगा। ऐसा जीवन मनुष्य को मुक्ति दिलाता
है। वह इस पथ पर चल कर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
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