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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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जब यह समय आया कि वह नन्हीं कस्तूरबा भागी, तब तो काबा जी
चकराये कि अब क्या उपाय हो सकता है? तो, उन्होंने तो हरिकृष्ण बापू जैसे
घर-घर गये, उन्होंने सब उपाय से जी भर दिया तो देखा वैष्णव तो रो रहे हैं।
उनके रोने का कष्ट देखकर तो वैष्णव रोते कभी न थे। बापू
वैष्णव केवल इस वास्ते रो रहे थे कि प्रभु को जो भोग लगा दिया था
वह अब दूसरा भोग जब तक न हो तब तक वह, ठाकुर जी भूखे रहेंगे
सो कष्ट था उन्हें, उधर कस्तूरबा के हाथ से जो हो गया था उसका तो
वह कष्ट भोग रहे थे, तो बापू बोले कि, हे वैष्णव तुम धीरज धरो। भगवान् तो
सब का कष्ट मिटाने वाले हैं। प्रभु का नाम जप करो सब ठीक होगा।
ऐसा कह के चले गये, पर जा के वह प्रभु आगे बैठ गये और प्रभु की आज्ञा
जब हो गई, तो हरिकृष्ण कस्तूरबा के पास गये और बोले कि जाइके क्षमा
मांगो। फिर कस्तूरबा जा के बैठ गई और प्रभु से, हे प्रभु तू तो कृपानिधि
है, कृपा कर कस्तूरबा के सब दोषों को, क्षमा कर कस्तूरबा को दी गई
आज्ञा, फिर जब कस्तूरबा सब विधि जान गई वैष्णवों के भय से डर के
रो रही, कस्तूरबा भगवान् को हाथ जोड़ रक्षक रक्षक कह, फिर प्रभु,
सब जन जान, कृपा करो, भक्तों के स्वांग को भगवान् को जानना, प्रभु तो
सबके घट की जाने।
जब रात बीती और सब ने उठ कर स्नान संध्या किया तो, सो तो बा--
पूजी ने ध्यान में देखा
कि साक्षात् प्रभु कस्तूरबा के गोद स्वरूप विराजते।
सो सब जन उठ कस्तूरबा को प्रणाम करने लगे, सब रो रहे
थे, सब को भय था कि इस मूर्ति रूप में प्रभु रूप होके प्रकट हुये तो
हम से जो बन पड़े सो प्रभु की सेवा में करें, पर सो सब जन रो, के तो
प्रभु बोले कि, तू कृपा कर सब जन पर।
"वैष्णव सब शरण गये, तो वैष्णव रूप प्रभु प्रकट सब को, वैष्णवों
द्वारा अपना यश सब को दिखाया और सब वैष्णव सब को भोग लगा भोग
कराया और वैष्णव जन, जो प्रभु के शरणागत होके सब कुछ करते
वैष्णव रूप प्रभु को भोग लगा आगे वैष्णव रूप प्रभु सब जन को भोग
देकर सब वैष्णव तृप्तता को पा के प्रभु सब जन वैष्णव रूपी प्रभु की
जय जय रूप सब ने उच्चारण किया सब ने वैष्णव रूपी प्रभु के चरण छुए
सब ने जो भोग दिया घर-घर जाकर सब जन सब को प्रभु का भोग सब जन
दिया, सो सब वैष्णव का कल्याण हुआ।"
सो सब जन देख के, कस्तूरबा के, वचन से, वैष्णवों का मान हो,
कस्तूरबा रूपी बा-पू के चरणों में वैष्णव चरणों को वैष्णव रूप मानकर
कस्तूरबा के आगे सब शीश नवा रहे।
बापू जब ध्यान करके उठे सब वैष्णव, जन, कस्तूरबा, सबने अपने
अज्ञान के भाव मिटाके जो कस्तूरबा बा-पू थे, उनके श्री चरणों में साष्टांग
प्रणाम कर सबने अपने अज्ञान को मिटा-कर वैष्णव के जो भाव को समझा
वैष्णव रूप कस्तूरबा को वैष्णव रूप में देख सब वैष्णवों का
कल्याण हुआ सब सब लोग भाव प्रकाश कर प्रभु के नाम का स्मरण कर रहे
और ध्यान धर
रहे कि भगवान् के स्वरूप को जो सब समझ ले उस पर प्रभु कृपा हो
सो सब वैष्णव ने जान कर प्रभु के गुण को गाया; तो इस तरह बापू अपने
गांव को, फिर परिवार के सहित चले आये।
"हे प्रभु हम सब को सन्मति दो।"
हे प्रभु आज हम सब ने कस्तूरबा रूप देखा, हे प्रभु तेरी लीला
सब जन क्या जाने कोई कोई जन जाने व समझे; हे प्रभु सब को तू अपना,
प्रभु का दर्शन सब को मिले जिससे व जाने, हे भगवान्, सब जीवों का
कल्याण कर सब पर दया कर कष्ट मिटा दे सब जीवों को सब कष्ट से छुड़ा
कर सब जीवों को अपने ही नाम का दान देकर अपने चरणों शरण में तू
लीना।
जब बापू सब काम निपटा कर बाहर आंगन में आये तो क्या देखते
हैं कि एक वैष्णव रो रहा था कि अपने अज्ञान से प्रभु को कष्ट दिया
और उस जन का कस्तूरबा ने कष्ट निवारण कर उस पर दया की व प्रभु
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