एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in context"परम आदरणीय पावन चरण में बार बार सौ बार साष्टांग प्रणाम सहित पत्र का शुभ समाचार
विचार कर आशीर्वाद प्रदान करें तथा पत्र का उत्तर भी अवश्य भेजें जिससे इस अधम पापी को भी
प्रभु चरणों की भक्ति मिल सके।"
उक्त प्रकार पत्र लिखकर उसने फाड़कर अपनी जेबमें रखलिया।
उनके पश्चात उस साधुवेषधारी पुरुष का ध्यान पुनः प्रारम्भ
"भगवन् यह तो आपने बहुत ही बुरा किया हमारे साथ"
ऐसा कह कर भगवान् शंकर की उस भव्य प्रतिमा मूर्ति तरफ उसने दो दो अश्रु प्रवाह
की धारा छोड़ना तो प्रारम्भ
किया ही था कि उस मूर्ति के पीछे, जो भगवान् की प्रतिमा विशाल दिखाई पड़ती
उसके पेट तक का भाग तो पूरा दिखाई दे रहा था केवल दो चरणों का ही भेद था, उस पर
एक तो पर्दा सा था, सो वह पर्दा उड़ता उड़ता साम्ने दीवार से जा लगा सो तो कुछ भी
दिखता नह था सो यह बात, जो उस मूर्ति, का चरण था, वह तो न निकला
केवल दो चरण ही थे, जिनको देखकर उसने समझा कि यह जो ऊपर धड़ पड़ा
सो यह सब उस पर्दाके उड़ने पश्चात सो लगा, केवल चरणों तक ही सब विचार सो लगा
सो केवल दो पग पड़े थे। अब उसका पग भी इस पग से मिलता तो था। परन्तु सो पग
था, सो वह कुछ भिन्न था; लेकिन केवल इतना ही तो भेद था कि जो चरण, उस मूर्ति
रूप में दिख पड़ा उससे मिलता हुआ तो था परन्तु वह स्वयं उन चरणों से भिन्न तो
था ही फिर उसने उस स्थान पर
जो देखा सो यह, ध्यान मग्न था, केवल स्वयं था, ध्यान से भिन्न, केवल योग-
ध्यान द्वारा समस्त ही ज्ञान रूप से ज्ञात हुआ, इसलिए सो भेद तो सब जान गया
कि यह मूर्ति वास्तविक, केवल किसी के तपस्यासिद्ध रूप-रंग का यह प्रभाव पड़ा
जिसके यह दो चरणमात्र ही दिखे हैं इस समय और शेष तो सब लोप हुआ, जो
वास्तव में केवल उसका सूक्ष्म रूप ही रहा था, केवल तपस्या के बल से, उस
महातपस्वी ने केवल दो चरणों को केवल मात्र दर्शनीयता के लिए छोड़ दिया
और स्वयं तो सब कुछ समेट कर विलीन हो ही गया, केवल यह सब तो उसके
तपस्या प्रभाव का अलौकिक प्रभाव मात्र प्रत्यक्ष हो ही रहा था इस प्रकार,
उसने सब भेद को समझ
कर ही अपने मन में यह बात की, वास्तविकता वास्तव में सब इस
ही प्रकार, सच ही तो थी, विचार कर यह तो स्वयं आश्चर्य में डूब गया फिर
भी, भगवान् शंकर के सम्मुख दोनों हाथ जोड़कर उसने कहा कि हे शंकर यह तो
केवल आप ही लीला समझ, सब न ही समझता था, पर इस महान् तपस्वी के तो
दर्शन--दर्शन होकर भी न हो सके--कदाचित् इस संत का तो दर्शन पूरा हो
जाता इसलिए शंकर, तू यह कृपा करके कम से कम इतना तो कर देता, जिससे,
इनके चरण तक सब का भला कर ही देता सो उद्धार तो इसका होता, सब इस
प्रकार स्वयं मन में विचार
तो करता गया, सो सब अन्तर्यामी तो सब ही ज्ञान था ही किन्तु फिर
भी प्रभु ने उसकी इस उत्कट अभिलाषा जानकर सो तो उचित किया
जिससे कि जो इस तपस्वीका शरीर था--वास्तविक रूपमें कभी जीव--तो
वह भी था नहीं किन्तु तो, सब लोप था, सब शून्य था, सब प्रभु माया थी; न तो
कोई जीव बचा, न कोई ज्ञान शेष था, सब तो स्वयं विलीन हुआ था?
अब सब बात समझ कर वह रोता ही था, यदि ऐसा ही होना था प्रभु
तो सब कुछ सत्य ही, सब ही संत जन इस प्रकार ध्यान मग्न हो प्रभु चरण में
लीन हो ही गये इसलिए तो उस संत का कोई रूप तो बचा नह? क्या सो संत का
ज्ञान-युक्त रूप तो सब लीन हो ही गया न बचा था, तो सब माया ही तो थी
केवल दो पग मात्र स्वरूप रूप प्रत्यक्ष था सब इसके पीछे क्या? क्या केवल यह
माया ही का स्वरूप था सब कुछ संत जन का क्या?
ऐसा विचारकर केवल आर्तभाव से नयन जल से तर और स्वयं दुःखी, केवल
उस महातपस्वी मूर्ति स्वरूप के साक्षात् दर्शन मात्र से ही तृप्त हो जाना तो चाहता
अथवा सो, मन ही स्वयं सब कुछ जानता ही था, किन्तु फिर भी ध्यान का रूप,
केवल स्वयं रूप ज्ञान रूप अनुभव मात्र ही समझ कर फिर पश्चात्ताप-युक्त
केवल पग चरण स्पर्श कर अपनी भक्ति प्रदान कर स्वयं भी उनके चरणारविन्द की सेवा
का ही भाव विचार कर सोता रहा
जिसे भी केवल यह अन्तर्यामी ही कृपा जानकर उस पर न उस पर कृपा
कर उस पर दया की तथा सो, जो कुछ सब संत जन पर तो कृपा ही संत जन न
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