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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 170 of 318

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Page 170

अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५९
सभयं सम्भ्रमं वत्स मद्गौरवकृतं त्यज। 'वत्स! मेरे प्रति गौरव-बुद्धिसे होनेवाले इस भय
नैवं प्रियो मे भक्तेषु स्वाधीनप्रणयी भव ॥ ७१ और घबराहटको त्याग दो। मेरे भक्तोंमें तुम्हारे समान
कोई भी मुझे प्रिय नहीं है, तुम स्वाधीनप्रणयी हो जाओ
नित्यं सम्पूर्णकामस्य जन्मानि विविधानि मे। [अर्थात् यह समझो कि तुम्हारा प्रेमी मैं तुम्हारे वशमें
भक्तसर्वेष्टदानाय तस्मात् किं ते प्रियं वद ॥ ७२ हूँ]। मैं नित्य पूर्णकाम हूँ, तथापि भक्तोंकी समस्त
कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये मेरे अनेक अवतार
हुआ करते हैं; अतः तुम भी बताओ, तुम्हें कौन-सी
अथ व्यजिज्ञपद्विष्णुं प्रह्लादः प्राञ्जलिर्नमन्।
सलौल्यमुत्फुल्लदृशा पश्यन्नेवं च तन्मुखम् ॥ ७३ वस्तु प्रिय है?'॥ ७१-७२॥
तदनन्तर खिले हुए नेत्रोंसे भगवान्‌के मुखको सतृष्णभावसे
देखते हुए प्रह्लादने हाथ जोड़ नमस्कारपूर्वक उनसे यों
नाप्ययं वरदानाय कालो नैष प्रसीद मे। निवेदन किया—'भगवन्! यह वरदानका समय नहीं है,
त्वद्दर्शनामृतास्वादादन्तरात्मा न तृप्यति ॥ ७४ केवल मुझपर प्रसन्न होइये। इस समय मेरा मन आपके
दर्शनरूपी अमृतका आस्वादन करनेसे तृप्त नहीं हो रहा
ब्रह्मादिदेवैर्दुर्लक्ष्यं त्वामेव पश्यतः प्रभो। है। प्रभो! ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी जिनका दर्शन पाना
तृप्तिं नेष्यति मे चित्तं कल्पायुतशतैरपि ॥ ७५ कठिन है, ऐसे आपका दर्शन करते हुए मेरा मन दस
लाख वर्षोंमें भी तृप्त न होगा। इस प्रकार आपके दर्शनसे
अतृप्त रहनेवाले मुझ सेवकका चित्त आपके दर्शनके बाद
नैवमेतद्ध्यतृप्तस्य त्वां दृष्ट्वाऽन्यद् वृणोति किम्। और क्या माँग सकता है?'॥ ७३-७५ १/२ ॥
ततः स्मितसुधापूरैः पूरयन् स प्रियं प्रियात् ॥ ७६
तब मुस्कानमयी सुधाका स्रोत बहाते हुए उन
जगदीशने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लादको मोक्ष-
योजयन् मोक्षलक्ष्म्यैव तं जगाद जगत्पतिः। लक्ष्मीसे संयुक्त-सा करते हुए उससे कहा—'वत्स! यह
सत्यं मद्दर्शनादन्यद् वत्स नैवास्ति ते प्रियम् ॥ ७७ सत्य है कि तुम्हें मेरे दर्शनसे बढ़कर दूसरा कुछ भी
प्रिय नहीं है; किंतु मेरी इच्छा तुम्हें कुछ देनेकी है।
किंचित्ते दातुमिष्टं मे मत्प्रीयार्थं वृणीष्व तत्। अतः तुम मेरा प्रिय करनेके लिये ही मुझसे कुछ माँग
प्रह्लादोऽथाब्रवीद्धीमान् देव जन्मान्तरेष्वपि ॥ ७८ लो'॥७६-७७१/२॥
तब बुद्धिमान् प्रह्लादने कहा—'देव! मैं जन्मान्तरोंमें
भी गरुडजीकी भाँति आपमें ही भक्ति रखनेवाला आपका
दासस्तवाहं भूयासं गरुत्मानिव भक्तिमान्।
अथाह नाथः प्रह्लादं संकटं खल्विदं कृतम् ॥ ७९ दास होऊँ!' यह सुनकर भगवान्‌ने कहा—'यह तो
तुमने मेरे लिये कठिन समस्या रख दी-मैं तो तुम्हें
स्वयं अपने-आपको दे देना चाहता हूँ और तुम मेरी
अहं त्वात्मदानेच्छुस्त्वं तु भृत्यत्वमिच्छसि।
दासता चाहते हो! बुद्धिमान् दैत्यराजकुमार! दूसरे-दूसरे
वरानन्यांश्च वरय धीमन् दैत्येश्वरात्मज ॥ ८० वर माँगो'॥ ७८-८०॥
तब प्रह्लादने भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवान्
प्रह्लादोऽपि पुनः प्राह भक्तकामप्रदं हरिम्। विष्णुसे पुनः कहा—'नाथ! आप प्रसन्न हों; मुझे तो यही
प्रसीद सास्तु मे नाथ त्वद्भक्तिः सात्त्विकी स्थिरा ॥ ८१ चाहिये कि आपमें मेरी सात्त्विक भक्ति सदा स्थिर रहे।