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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 159 of 318

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Page 159

१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
स देवः सकलाध्यक्षो यथाहं त्रिजगज्जयी। | ''वही सबका अध्यक्ष देवता है, जैसा कि तीनों
त्यज जाड्यमतः शौर्यं भजस्व स्वकुलोचितम्॥ ५८ | लोकोंपर विजय पानेवाला मैं हूँ। इसलिये तू अपनी यह
| जडता त्याग दे और अपने कुलके लिये उचित वीरताका
अन्येऽपि त्वां हनिष्यन्ति वदिष्यन्ति जनास्त्विदम्। | आश्रय ले। तेरी यह कायरता देखकर दूसरे लोग भी तुझे
असुरोऽयं सुरान् स्तौति मार्जार इव मूषकन्॥ ५९ | मारेंगे और कहेंगे कि 'अरे! यह असुर होकर भी
| देवताओंकी उसी प्रकार स्तुति करता है, जैसे बिल्ली
द्वेष्यान् शिखीव फणिनो दुर्निमित्तमिदं ध्रुवम्। | चूहेकी स्तुति करे और मोर अपने द्वेषपात्र सर्पोंकी प्रार्थना
लब्ध्वापि महदैश्वर्यं लाघवं यान्त्यबुद्धयः॥ ६० | करे। ऐसा करना अवश्य ही अनिष्टका सूचक है। मूर्ख
| प्राणी महान् ऐश्वर्य पाकर भी [अपने खोटे कर्मोंके द्वारा]
यथायं मत्सुतः स्तुत्यः स्तावकान् स्तौति नीचवत्। | नीचे गिर जाते हैं, जैसे मेरा पुत्र प्रह्लाद, जो स्वयं स्तुतिके
रे मूढ दृष्ट्वाप्यैश्वर्यं मम ब्रूषे पुरो हरिम्॥ ६१ | योग्य था, आज नीच जनोंकी भाँति उन लोगोंकी स्तुति
| कर रहा है, जो स्वयं हमारी स्तुति करनेवाले हैं। रे मूर्ख!
असदृशस्य तु हरेः स्तुतिरेषा विडम्बना। | तू मेरा ऐश्वर्य देखकर भी मेरे सामने ही हरिका नाम ले
इत्युक्त्वा तनयं भूप जातक्रोधो भयानकः॥ ६२ | रहा है? वह हरि इस सम्मानके योग्य नहीं है, उसकी
| स्तुति विडम्बनामात्र है''॥ ५८—६११/२॥
जिह्मं निरीक्ष्य च प्राह तद्गुरुं कम्पयन् रुषा। | भूप! अपने पुत्रसे इस प्रकार कहकर वह इतना
याहि याहि द्विजपशो साधु शाधि सुतं मम॥ ६३ | कुपित हुआ कि उसका स्वरूप भयानक हो गया; फिर
| प्रह्लादके गुरुको टेढ़ी नजरसे देखकर उन्हें अपने रोषसे
प्रसाद इत्येष वदन् स विप्रो | कँपाता हुआ बोला—'मूर्ख ब्राह्मण! यहाँसे चला जा,
जगाम गेहं खलराजसेवी। | चला जा। अबकी बार मेरे पुत्रको अच्छी शिक्षा देना।'
विष्णुं विसृज्यान्वसरच्च दैत्यं | दुष्ट राजाकी सेवा करनेवाला वह ब्राह्मण 'बड़ी कृपा
किं वा न कुर्युर्भरणीय लुब्धाः॥ ६४॥ | हुई' यों कहता हुआ घर चला गया और विष्णुका भजन
| त्यागकर दैत्यराज (हिरण्यकशिपु)-का अनुसरण करने
| लगा। सच है, लोभी मनुष्य अपना पेट पालनेके लिये
| क्या नहीं कर सकते?॥ ६२—६४॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे नृसिंहप्रादुर्भावे एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतार' नामक इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥

बयालीसवाँ अध्याय
प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा किये गये अनेक प्रयत्न
मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—भगवान् विष्णुकी भक्ति ही
सोऽप्याशु नीतो गुरुवेश्म दैत्यै- | जिनका भूषण है, वे दैत्यराजकुमार योगी प्रह्लादजी शीघ्र
दैत्येन्द्रसूनुर्हरिभक्तिभूषणः । | ही सारथिके साथ गुरुके घर भेजे गये। वहाँ वे कालक्रमसे
अशेषविद्यानिवहेन साकं |
कालेन कौमारमवाप योगी॥ १ | सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानके साथ कुमारावस्थाको प्राप्त
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