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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 141 of 318

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Page 141

१३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७
तेनैव निधनं प्राप्तो यथा राजन् महाबलः। महाकाय वराह-अवतार लेकर [अपनी दाढ़ोंपर] इस
हिरण्याक्षो महावीर्यो दितिपुत्रो महातनुः॥ ४ पृथ्वीको उठाया तथा राजन्! उन्हींके हाथसे जिस प्रकार
महाबली, महापराक्रमी और महाकाय दितिकुमार हिरण्याक्ष
यथा हिरण्यकशिपुस्त्रिदशानामरिः पुरा। मारा गया; राजन्! फिर उन भगवान्ने नृसिंहरूप धारणकर
नरसिंहेन देवेन प्रापितो निधनं नृप॥ ५ पूर्वकालमें जिस प्रकार देवताओंके शत्रु हिरण्यकशिपुका
वध किया; और राजकुमार! जिस प्रकार उन महात्माने
यथा बद्धो बलिः पूर्वं वामनेन महात्मना। वामनरूप होकर पूर्वकालमें राजा बलिको बाँधा तथा
इन्द्रस्त्रिभुवनाध्यक्षः कृतस्तेन नृपात्मज॥ ६ इन्द्रको (फिरसे) त्रिभुवनका अधीश्वर बना दिया; और
राजन्! भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रका अवतार धारणकर
रामेण भूत्वा च यथा विष्णुना रावणो हतः। जिस प्रकार रावणको मारा एवं देवताओंके लिये कण्टकरूप
सगणाश्चाद्भुता राजन् राक्षसा देवकण्टकाः॥ ७ अद्भुत राक्षसोंका उनके गणोंसहित संहार कर दिया; फिर
पूर्वकालमें परशुराम-अवतार ले, जिस प्रकार क्षत्रियकुलका
यथा परशुरामेण क्षत्रमुत्सादितं पुरा। उच्छेद किया तथा बलभद्ररूपसे जिस प्रकार प्रलम्बादि
बलभद्रेण रामेण यथा दैत्यः पुरा हतः॥ ८ दैत्योंका वध किया; कृष्णरूप होकर कंस आदि देवशत्रु
दैत्योंका जिस तरह संहार किया; इसी प्रकार कलियुग
यथा कृष्णेन कंसाद्या हता दैत्याः सुरद्विषः। प्राप्त होनेपर जिस प्रकार भगवान् नारायण बुद्धरूप धारण
कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः॥ ९ करेंगे; फिर कलियुग समाप्त होनेपर जिस प्रकार वे
कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका नाश करेंगे, वह सब
कल्किरूपं समास्थाय यथा म्लेच्छा निपातिताः। वृत्तान्त उसी प्रकार मैं तुमसे कहूँगा॥ २-१०॥
समाप्ते तु कलौ भूयस्तथा ते कथयाम्यहम्॥ १०
हरेरनन्तस्य पराक्रमं यः भूपाल! जो एकाग्रचित्त होकर मेरे द्वारा बताये
शृणोति भूपाल समाहितात्मा। जानेवाले अनन्त भगवान् विष्णुके इन पराक्रमोंका श्रवण
मयोच्यमानं स विमुच्य पापं करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान्के अत्यन्त
प्रयाति विष्णोः पदमत्युदारम्॥ ११ उदार परमपदको प्राप्त होगा॥ ११॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे हरेः प्रादुर्भावानुक्रमणे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीहरिके अवतारोंकी अनुक्रमणिका' (गणना) विषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध
मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—महात्मा भगवान् अच्युतके बहुत-
नानात्वादवताराणामच्युतस्य महात्मनः। से अवतार हैं, सुतरां उनका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं
न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तान् ब्रवीमि समासतः॥ १ किया जा सकता; इसलिये मैं उन्हें संक्षेपसे ही कहता हूँ।
पुरा किल जगत्स्रष्टा भगवान् पुरुषोत्तमः। यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें जगत्की सृष्टि करनेवाले
अनन्तभोगशयने योगनिद्रां समागतः॥ २ भगवान् पुरुषोत्तम 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी
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