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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 90 of 304

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Page 90

वास्तविक स्वामी उस सम्पत्ति की सुध-खबर नहीं लेता, देखभाल नहीं करता,
लिखित प्रमाण रखने पर भी सौ वर्षों तक अपनी सम्पत्ति को अपने अधिकार में
नहीं लेता, तो उस लेख की वैधता समाप्त हो जाती है। उस पर क़ब्ज़ा करने वाला
ही स्वामी बन जाता है।
आहूतैर्वाभियुक्तः स्यान्नाथार्थान्नामुद्धरेत्पदम्।
भुक्तिरेव विशुद्धःस्यात् प्राप्तौ या पितृतः क्रमात् ॥ 90 ॥
यदि किसी की सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा करने वाले पर मूल स्वामी द्वारा अभियोग
चलाया जाता है और न्यायाधिकारी निर्धारित राशि का भुगतान पाने पर उसे क़ब्ज़े
को ख़ाली करने का आदेश तो सुनाते हैं, परन्तु सम्पत्ति को छुड़ाने का इच्छुक एवं
वास्तविक स्वामी न्यायाधिकारी द्वारा निर्धारित अवधि में निर्दिष्ट राशि का भुगतान
नहीं करता है अथवा नहीं कर पाता है और इधर क़ब्ज़ा बाप-दादा के समय से
चला आ रहा है, तो वह सम्पत्ति विशुद्ध रूप से क़ब्ज़ा करने वालों के स्वामित्व में
चली जाती है और फिर मूल स्वामी अपना दावा प्रस्तुत नहीं कर सकता।
अभिप्राय यह है कि मूल स्वामी दूसरे के क़ब्ज़े में गयी अपनी सम्पत्ति को
छुड़ाने को लिए न्यायाधिकरण की शरण लेता है, तो उसे न्यायाधिकारी द्वारा किये
निर्णय का पालन अवश्य करना चाहिए, अन्यथा वह सदा के लिए अपनी सम्पत्ति
से हाथ धो बैठता है।
अन्यायेनापि यद्भुक्तं पितुः पूर्वस्तरैस्त्रिभिः ।
न तच्छक्यमपाहर्तुं क्रमात्त्रिपुरुषागतम् ॥ 91 ॥
अन्यायपूर्वक ही क्यों न हो, निरन्तर अविच्छिन्न रूप से पिता से भी पहले
तीन-चार पीढ़ियों से चले आ रहे क़ब्ज़े को निरस्त नहीं किया जा सकता। ऐसा
क़ब्ज़ा अवैध होते हुए भी वैध बन जाता है।
अभिप्राय यह है कि तीन-चार पीढ़ियों तक अपनी सम्पत्ति की उपेक्षा करने
वाले, अपनी सम्पत्ति पर दूसरे के क़ब्ज़े को चुनौती न देने वाले को सम्पत्ति के
स्वामित्व को बनाये रखने का कोई अधिकार ही नहीं रह जाता।
अन्वाहितं हृतं न्यस्तं बलावष्टब्धयाचितम्।
अप्रत्यक्षं च यद् भुक्तं षडेतान्यागमं बिना ॥ 92 ॥
निम्नोक्त छह परिस्थितियों में किये गये क़ब्ज़े को भी वैधता एवं चुनौती दी
जा सकती है और उसे निरस्त कराया जा सकता है-

  1. किसी एक को विश्वास से दी गयी सम्पत्ति को उसके द्वारा स्वामी की
    अनुमति एवं जानकारी के बिना किसी अन्य को दे देना (किरायेदार द्वारा किराये के
    मकान, खेत आदि को किसी अन्य को किराये पर उठा देना)।
  2. बलपूर्वक हरण करना।
    88 / नारदस्मृति