Skip to content
SarvaKosh
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 83 of 304

Read in context
Page 83

धन-सम्पत्ति के स्वामित्व के साधक तीन प्रमाण हैं—1. लिखित (दस्तावेज़),
2. साक्षी तथा, 3. भुक्ति-कब्ज़ा। किसने, कब, कहां और कैसे विचारणीय सम्पत्ति
को प्राप्त किया है, इसका निर्णय इन्हीं तीन प्रमाणों के आधार पर किया जाता है।
नाकरिष्यद्यदा स्रष्टा लिखितं चक्षुरुत्तमम्।
तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यच्छुभा गतिः॥ 70 ॥
यदि विश्वनियन्ता परमपिता परमेश्वर ने मनुष्यों को उत्तम ज्ञानेन्द्रिय चक्षु
प्रदान न की होती, तो मनुष्य न कुछ देख पाता और न ही कुछ लिख पाता, अर्थात्
अपने प्रत्यक्ष अनुभव को स्थायी रूप से सुरक्षित कर ही नहीं पाता, जिसका अर्थ
लिखित प्रमाण की अनुपलब्धि होता। इससे संसार का कल्याण न हो पाता। सब से
अधिक विश्वस्त एवं प्रामाणिक लिखित प्रमाण के अनुपलब्ध होने से व्यवहार
सुलझ न पाते तथा सन्देह की स्थिति और अव्यवस्था का प्रसार हो जाता। अभिप्राय
यह है कि लोगों को विधाता की इस देन के लिए विधाता के प्रति चिर-कृतज्ञता का
भाव रखना चाहिए।
देशकालफलद्रव्यप्रमाणावधिनिश्चये ।
सर्वसन्देहविच्छेदि लिखितं चक्षुरुत्तमम्॥ 71 ॥
देश—किसने, किस स्थान पर दिये लिये, काल—कब, किस वर्ष, मास,
दिन, तिथि को दिये लिये, फल—क्यों लिया दिया, अर्थात् आवश्यकता एवं
प्रयोजन आदि, द्रव्य—लेन-देन की वस्तु-विशेष, प्रमाण—स्वरूप, आकार
प्रकार, भार, (वज़न) स्थूलता, लम्बाई चौड़ाई आदि तथा अवधि—परिस्थितियों
तथा शर्तों आदि का एकमात्र निश्चित प्रमाण जुटाने वाला साधन चक्षु है। यह सभी
सन्देहों का निवारक तथा विवादों का समापक एवं निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचाने
वाला पूर्णतया विश्वसनीय साधन है। अतः इसे व्यक्ति को विधाता की उत्तम देन
मानना सर्वथा उपयुक्त ही है।
गृहीत्वापि स्थले द्रव्यं योऽपह्नवितुमिच्छति।
स्थापितः साक्षिभिर्मार्गे स दुःसाध्योऽपि साध्यते ॥ 72 ॥
यदि स्थान-विशेष पर लिये गये किसी पदार्थ को हड़पने की इच्छा वाला
व्यक्ति मुकर जाता है, तो इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए उस स्थान पर
उपस्थित साक्षियों की सहायता लेनी पड़ती है, परन्तु प्रायः यह सहज साध्य कार्य
नहीं होता; क्योंकि वस्तु देते समय साक्ष्य की आवश्यकता पड़ने की सम्भावना पर
विचार ही नहीं किया जाता। अतः साक्षियों की उपस्थिति हो भी सकती है और
नहीं भी हो सकती है। यही कारण है कि इसे दुःसाध्य कार्य माना जाता है; क्योंकि
यदि साक्षियों के समक्ष कुछ हुआ ही नहीं, तो साक्ष्य कहां से जुटाया जायेगा ? फिर
यह भी निश्चित नहीं है कि साक्षी जीवित होंगे, उसी स्थान पर रह रहे होंगे तथा
उन्हें सब कुछ यथावत् स्मरण भी होगा।
नारदस्मृति / 81