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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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को भी अपने तीखे प्रश्नों एवं तर्कों से व्यवहार से सम्बद्ध प्राणियों के चित्त में धंसे
राग-द्वेष, माया-मोह के कारण सत्य को छिपाने के प्रयास को नकारते हुए सत्य को
उजागर-प्रतिष्ठित कराना चाहिए।
अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार चिकित्सक के प्रयासों से पीड़ा अनुभव
करते हुए भी रोगी अपने को उसके समक्ष समर्पित करने में अपना हित समझता है,
उसी प्रकार सभ्यों को भी समझना चाहिए कि वे अपने प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों से वादी-
प्रतिवादी के हृदय में धंसे पापशल्य को निकालने के रूप में उसका उपकार ही कर
रहे हैं। अभियुक्त भले ही सभ्यों के प्रश्नों से तिलमिलाहट अनुभव करे, परन्तु उसे
यह भली प्रकार से ज्ञात होता है कि यह तो सभ्यों का कर्तव्य एवं धर्म है। आखिर
वे न्यायालय में इसीलिए तो बैठे हैं। यदि वे अपराधी को टटोलेंगे नहीं, तो क्या
अपराधी अपना अपराध अपने आप उगल देगा ? यदि लोग ऐसे सीधे और सच्चे
होते, तो फिर न्यायालयों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती ? इस प्रकार न तो सभ्यों
को दोनों पक्षों-वादी तथा प्रतिवादी-से प्रश्नों को पूछने में संकोच करना चाहिए
और न ही वादी, प्रतिवादी तथा साक्षी को इसे अन्यथा लेना चाहिए।
यत्र सभ्यो जनः सर्वः साध्वेवदिति मन्यते।
स निःशल्यो विवादः स्यात् सशल्यः स्यादतोऽन्यथा ॥ 17 ॥
जब सभी सभ्य व्यवहार के निरीक्षण-परीक्षण के उपरान्त एकमत से-यही
उचित है-ऐसा मानते हैं, अर्थात् एक ही निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो ऐसे विवाद को
सम्यक् निर्णीत ही समझना चाहिए, अन्यथा सभी सभ्यों के एकमत न होने पर
विवाद निष्कण्टक नहीं हो पाता। अभिप्राय यह है कि बहुमत के आधार पर
व्यवहार को निपटा तो दिया जाता है, परन्तु मतभेद बने रहने का स्पष्ट अर्थ तो यही
है कि उसमें अनसुलझा तथ्य रह गया है।
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ॥ 18 ॥
सभा-न्यायालय अथवा लोकसंसद-में वृद्धों-ज्ञान, आयु, चरित्र तथा
सत्यनिष्ठा में प्रमाणित आप्तपुरुषों-का होना आवश्यक है। जिस सभा में वृद्ध पुरुष
नहीं, वह सभा सभा कहलाने की अधिकारिणी ही नहीं, वृद्धों से ही सभा सभा
कहलाती है। उन वृद्धों-ज्ञान, विवेक, पाण्डित्य तथा सत्य पर दृढ़ता आदि गुणों
से रहित व्यक्तियों-को वृद्ध नहीं मानना चाहिए। आयु की वृद्धि तथा केशों के
पकने और त्वचा की संकुचितता का नाम वार्द्धक्य नहीं, वार्द्धक्य तो विचारों की
नारदस्मृति / 59