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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 38 of 304

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निर्णिक्तव्यवहारेषु प्रमाणमफलं भवेत्।
लिखितं साक्षिणो वापि पूर्वमावेदितं न चेत्॥ ६२॥
व्यवहार-निर्णय से पूर्व लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि प्रस्तुत करने की
अनुमति देने के लिए आवेदन न किये जाने पर अथवा आवेदन करने और अनुमति
मिलने पर यथासमय लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि उपस्थापित न किये जाने
पर, निर्णय घोषित हो जाने के उपरान्त प्रमाणों के उपस्थापित करने की प्रार्थना को
निरर्थक मानते हुए निरस्त कर देना चाहिए और घोषित निर्णय को स्थिर बनाये
रखना चाहिए।
यथा पक्वेषु धान्येषु निष्फलाः प्रावृषो गुणाः।
निर्णिक्तव्यवहाराणां प्रमाणमफलं तथा॥ ६३॥
उपर्युक्त तथ्य—निर्णय घोषित करने के उपरान्त प्रमाणों को देखने की दुहाई
की निरर्थकता—के समर्थन में स्मृतिकार का कथन है कि जिस प्रकार धान्य के
पक जाने पर वर्षा की कोई उपयोगिता नहीं होती, उसी प्रकार व्यवहार का निर्णय
हो जाने के उपरान्त प्रमाण आदि के होने की भी कोई उपयोगिता नहीं होती।
अभूतमप्यभिहितं प्राप्तकालं परीक्षयेत्।
यत्तु प्रमादान्नोच्येत तद्भूतमपि हीयते॥ ६४॥
व्यवहार में असत्य प्रतीत होने वाले वक्तव्य अथवा तथ्य की प्रश्न आदि से,
साक्ष्य से, लिखित प्रमाण से अथवा अपनी जानकारी से अथवा अन्यान्य किन्हीं
विश्वस्त स्रोतों से वास्तविकता का पता लगाने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रयास
में चूक अथवा प्रमाद अथवा उपेक्षा होने पर सत्य का गला घुट सकता है तथा
अन्याय न्याय को दबा सकता है। अतः विशेष सावधानी बरतनी आवश्यक है।
तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः।
द्विगुणं दण्डमास्थाय तत्कार्यं पुनरुद्धरेत्॥ ६५॥
विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद के उपरान्त परिणाम पर पहुंचे और घोषित
निर्णय—जय-पराजय तथा दण्ड-विधान आदि—वाले व्यवहार के विरुद्ध पुनर्विचार
की प्रार्थना करने वाले को पराजित होने पर दुगुना दण्ड भुगतने को सहमत होने की
लिखित शपथ लेनी होती है। इसी आधार पर उसकी प्रार्थना स्वीकार की जानी चाहिए।
दुर्दृष्टे व्यवहारे तु सभ्यास्तं दण्डमाप्नुयुः।
न हि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते॥ ६६॥
यदि न्यायाधिकरण (ज्यूरी) के सदस्य अज्ञान, प्रमाद अथवा पक्षपात व
राग-द्वेष के कारण ग़लत व्यवहार करते हैं, तो उन्हें भी दण्डित करना चाहिए।
न्याय के प्रति विश्वासघात को दण्डनीय अपराध ही मानना चाहिए। वस्तुतः दण्ड
ही एकमात्र ऐसा साधन है, जिसके भय से व्यक्ति पापाचरण, अन्याय-प्रवर्तन तथा
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