नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextपहले कोई दूसरा मामला नहीं चलाना चाहिए; क्योंकि पहले से ही दुखी प्राणी को
और अधिक दुखी नहीं करना चाहिए।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्य स्मृति में भी इस मत का समर्थन किया गया है—
अभियोगमनिस्तीर्य नैनं प्रत्यभियोजयेत्।
अभियुक्तं च नान्येन नोक्तं विप्रकृतिं नयेत्॥
अर्थात् जब तक अभियुक्त एक अभियोग में उलझा है, उससे निपट नहीं
जाता है, तब तक किसी अन्य द्वारा उसे किसी दूसरे मामले में नहीं फंसाना चाहिए।
यमर्थमभियुञ्जीत न तं विप्रकृतिं नयेत्।
नान्यत् पक्षान्तरं गच्छेद् गच्छन् पूर्वात् स हीयते ॥ ५६ ॥
अभियोग को एक बार जिस वर्ग, श्रेणी तथा उपवर्ग में रखा जाता है, उसे
कभी बदलना नहीं चाहिए। उसी परिप्रेक्ष्य में उस पर विचार, विवाद, निरीक्षण
और निर्णय करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अभियुक्त को भी अपने पक्ष को छोड़कर
दूसरे पक्ष को ग्रहण नहीं करना चाहिए। एक बार जो स्थिति अपना ली, उसी पर
डटे रहना चाहिए। स्थिति बदलते रहने से मामले के प्रति न्याय नहीं हो पाता।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्यस्मृति में इस तथ्य को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया
है—यदि स्वर्ण की चोरी का मामला दर्ज कराया गया है, तो कभी धान्य की चोरी
की बात नहीं करनी चाहिए। न ही साक्षियों को स्वर्ण की चोरी से भिन्न कुछ कहना
चाहिए। इतना ही नहीं, अभियुक्त ने स्वर्ण के साथ-साथ धान्य भी चुराया है—यह
भी नहीं कहना चाहिए। ऐसा न करने वाले को निश्चित रूप से पराजय का मुख ही
देखना पड़ता है—'हिरण्यं लेखयित्वा साक्षिप्रश्नकाले धान्यमिति। नान्यत्पक्षान्तर-
मिति गच्छेत् साक्षिणमुद्दिश्येत्युक्तम्। नार्थान्तरमुद्दिश्येति। इदमन्यन्मम धारयति
तत् तावद् दाप्यतां तिष्ठन्तु साक्षिण इति। स पूर्वोक्तादर्थाद्धीयते। तत्र पराजीयत्
इत्यर्थः। तच्च न लभते, दण्डश्चेति।'
न च मिथ्याभियुञ्जीत दोषो मिथ्याभियोगिनः ।
यस्तत्र विनयः प्रोक्तः सोऽभियोक्तारमाव्रजेत् ॥ ५७ ॥
काम, क्रोध तथा लोभ आदि के वशीभूत होकर कभी किसी पर झूठा
अभियोग नहीं चलाना चाहिए। मिथ्या आरोप लगाने वाले को स्मरण रखना चाहिए
कि अपराधी को दिया जाने वाला, अर्थात् निर्धारित दण्ड आरोप के झूठा प्रमाणित
होने पर मिथ्याभाषी को दिया जाता है।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार किसी निर्दोष पर गुरु-पत्नीगामी
का मिथ्या आरोप लगाने वाले को गुरुपत्नीगमन-जैसे जघन्य अपराध के लिए
निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए—अगुरुतल्पगः गुरुतल्पग इत्युक्ते
गुरुतल्पगस्य यत्कार्यं तदभियोक्तुः कर्त्तव्यम्।
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