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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 276 of 304

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Page 276

भी अधिक मूल्य की मुद्रा कार्षापण है। एक प्रकार से कार्षापण का मूल्य साठ
अथवा अस्सी काकिणी है।
कार्षापणावराद् यस्तु चतुः कार्षापणावरः।
द्व्यवरोऽष्टापरश्चान्यस्त्र्यवरो द्वादशोत्तरः॥५६॥
इस प्रकार विभिन्न अपराधों के लिए निर्दिष्ट एक, दो, तीन तथा चार कार्षापणों
से क्रमशः बीस, चालीस, अस्सी तथा एक सौ साठ काकिणी समझना चाहिए।
कार्षापण के मूल्य में न्यूनाधिकता मान्य होने के कारण अपराध विशेष के लिए
निर्दिष्ट दण्ड कार्षापण का सवाया अथवा ड्योढ़े, 2 का 2½, 3, 4 का 5, 6 तथा
8 का 12 किया जा सकता है, इससे अधिक नहीं।
कार्षापणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः प्रवर्तते ।
पणैर्निबद्धः पूर्वस्यां विंशतिस्तु पणाः स तु ॥ ५७ ॥
दक्षिण भारत (आन्ध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल) में कार्षापण का
मूल्य चांदी का एक रुपया है। पूर्व भारत (बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा असम) में
सवा रुपया (बीस आने) को (बीस-पच्चीस वर्ष पूर्णदशमलव पद्धति नहीं अपनाये
जाने पर रुपये के सोलह आने और तौल में सेर की सोलह छटांकें मान्य एवं
प्रचलित थीं) कार्षापण माना जाता है।
माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य तु।
काकिणी तु चतुर्थांगी माषस्य च पणस्य च ॥ ५८ ॥
कार्षापण का बीस आना मूल्य मानने पर उसके बीसवें भाग को माष
(आना) कहा जाता है और एक माष की चार काकिणी (पैसे) होते हैं।
पञ्चनद्याः प्रदेशे तु संज्ञा या व्यावहारिकी ।
कार्षापणप्रमाणं तु निबद्धमिह नेतया ॥ ५९ ॥
पञ्चनद प्रदेश-आज तो पूर्वी पंजाब के पाकिस्तान में चले जाने से पांच
नदियों का प्रदेश तीन नदियों वाला रह गया है। इसके अतिरिक्त उसके भी तीन
भागों-पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल हो गये हैं- में तो सोलह आने मूल्य के
कार्षापण का लोकव्यवहार में पर्याप्त प्रचलन है। इसलिए उसे लिपिबद्ध करना
आवश्यक नहीं समझा गया।
कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया ताश्चतस्त्रस्तु धानकः ।
तद्द्वादश सुवर्णस्तु दीनारण्यः स एव च ॥ ६०॥
सबसे बड़ा सिक्का कार्षापण है, चार कार्षापणों के योग का नाम धानक है।
बारह धानकों का योग सुवर्ण कहलाता है और इसी सुवर्ण का नाम दीनार है।
वार्तां तु यां चाप्यथ दण्डनीतिम्
राजाऽनुवर्त्तेत सदाऽप्रमत्तः ।
274 / नारदस्मृति