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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 274 of 304

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Page 274

यदि चोरी करने पर चोर पश्चात्ताप की आग में जलता हुआ व मुक्तकेश
अवस्था में चारों ओर दौड़ता हुआ, उच्च स्वर में अपने पाप को सार्वजनिक रूप से
घोषित करता है और रुदन करता हुआ राजा के पास जाता है तथा दण्ड के लिए
अपने आपको प्रस्तुत करता है, तो ऐसे चोर को सुधरने का अवसर देना चाहिए।
अपने मुख से ही अपने पाप को स्वीकार करने, अपने कृत्य पर लज्जित होने, दण्ड
के लिए अपने को प्रस्तुत करने वाले के प्रति राजा को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण
अपनाते हुए उसे क्षमा कर देना चाहिए तथा अपने हाथ के स्पर्श से उसे पवित्र बना
देना चाहिए।
टिप्पणी—राजा के हाथ का स्पर्श पतित को पवित्र बनाने वाला माना गया
है।
राजाभिर्धृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ 48॥
यदि पापाचारी व्यक्ति अपने पापों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं, राजा के समक्ष
अपने आपको दण्ड के लिए प्रस्तुत करते हैं तथा राजा द्वारा प्रदत्त दण्ड को सहर्ष
स्वीकार करते हैं, तो वे भी पापमुक्त एवं शुद्ध होकर सन्तों के समान मरणोपरान्त
स्वर्गलोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वास्तेनो मुच्यति किल्बिषात्।
अशासनात्तु तद्राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ 49॥
राजा द्वारा अपने सामने उपस्थित चोर पर अनुग्रह करने, अर्थात् बिना दण्ड
दिये मुक्त करने अथवा समुचित दण्ड देने पर चोर पाप-मुक्त हो जाता है। राजा को
यह नहीं भूलना चाहिए कि चोर को दण्ड दिये बिना छोड़ देने पर, अर्थात् किसी
प्रकार का पश्चात्ताप करने पर चोर के पाप का फल स्वयं राजा को भुगतना पड़ता
है।
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अतः प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥ 50॥
विवेकहीन सज्जनों के शासक तो उनके गुरुजन होते हैं और दुष्ट आततायियों
पर राजा का ही शासन रहता है। अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान् व्यक्तियों द्वारा
अपराध हो जाने अथवा किये जाने पर गुरुओं द्वारा उन्हें समझाना पर्याप्त होता है।
वे प्रबोधन से ही अपराधवृत्ति का त्याग कर सन्मार्ग ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु दुष्ट
व्यक्ति समझाने-बुझाने की भाषा को नहीं समझते—‘लातों के भूत बातों से नहीं
मानते’—उन्हें सन्मार्ग पर लाने का एकमात्र उपाय दण्ड ही है और यह कार्य राजा
ही कर सकता है।
इन दोनों—प्रकट सज्जनों और प्रकट दुर्जनों—के अतिरिक्त, भीतर से दुर्जन,
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