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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 249 of 304

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Page 249

विकलांग—काणा, लंगड़ा, लूला तथा बहरा आदि—को विकलांग कहने,
अर्थात् चिढ़ाने वाले से कम-से-कम एक कौड़ी दण्ड के रूप में वसूली जा सकती
है। इसका अर्थ है कि अधिक दण्ड भी दिया जा सकता है।
न किल्विषेणापवदेच्छास्त्रतः कृतपावनम्।
न राज्ञा धृतदण्डं च दण्डभाक् तद्व्यतिक्रमात्॥ 19॥
अपराधी द्वारा अपने अपराध का राजा द्वारा निर्दिष्ट दण्ड भुगतने तथा प्रायश्चित्त
करने के उपरान्त, किसी को भी उसके अपराध के लिए उसकी निन्दा करने का
कोई अधिकार नहीं मिलता। ऐसा करने वाला दण्ड का भागी होता है। दण्ड भुगतने
और प्रायश्चित्त करने पर अपराध को समाप्त हुआ ही समझना चाहिए।
लोकेऽस्मिन् द्वाववक्तव्याववध्यौ च प्रकीर्तितौ।
ब्राह्मणश्चैव राजा च तौ हीदं विभृतो जगत्॥ 20॥
इस संसार के पालक और रक्षक होने के कारण ब्राह्मण और राजा की उनके
द्वारा किये किसी अपराध के लिए न तो निन्दा की जा सकती है और न ही उन्हें
दण्ड दिया जा सकता है। वस्तुतः मान्यता यह है कि राजा और ब्राह्मण कभी कुछ
ग़लत करते ही नहीं है।
टिप्पणी—इंग्लैण्ड में भी राजा के विषय में यह सर्व-सम्मत धारणा है—
"King does no sin" अर्थात् राजा तो कभी कोई पापकर्म करता ही नहीं है।
पतितं पतितेत्युक्त्वा चौरं चौरेति वा पुनः।
वचनात्तुल्यदोषः स्यान्मिथ्या द्विर्दोषतां व्रजेत्॥ 21॥
पतित व्यक्ति को पतित और चोर को चोर कहकर अपमानित करने वाला भी
उनके समान दोषी होता है। निर्दोष पर दोषारोपण करने वाला दुगुने दोष का भागी
बनता है। अभिप्राय यह है कि बिना पुष्टि के न तो किसी पर दोषारोपण करना
चाहिए और न ही किसी को 'अपराधी' कहकर निरर्थक अपमानित ही करना
चाहिए।
एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥ 22॥
शूद्र द्वारा वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण के प्रति तीखे, कड़वे, अश्लील और
विषैले वचन बोलकर उनका अपमान करने पर उसकी जिह्वा काट डालनी चाहिए।
नीच-जन्मा शूद्र के ऐसे दुस्साहस को तो असह्य व्यवहार और अक्षम्य अपराध ही
समझना चाहिए।
टिप्पणी—शूद्र को 'जघन्य प्रभव,' अर्थात् नीच स्थान से उत्पन्न मानने के
विरुद्ध मध्यकालीन कवियों की उक्तियां दर्शनीय हैं—
नानक—'एक मूल से सब उत्पन्ना, को ब्राह्मण को शूद्रा।'
नारदस्मृति / 247