नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextसमेऽध्वनि द्वयोर्यत्र तेन प्रायोऽशुचिर्जनः ।
पूर्वापराधैर्दुष्टा वा संसृष्टा वा दुरात्मभिः ॥ २५ ॥
समतल मार्ग पर चोरों के पदचिह्नों के साथ अन्यान्य यात्रियों के पदचिह्नों के
भी मिलने पर आसपास के निवासियों को चोरों से मिला हुआ तथा चोरी में
सम्मिलित समझना चाहिए। छानबीन करने पर चोरों का वहां छिपा होना निश्चित
होता है। चोरों के साथ मिले लोगों को भी यथोचित रूप से दण्डित करना चाहिए।
ग्रामेष्वन्वेषणं कुर्युश्चाण्डालवधिकादयः ।
रात्रिसञ्चारिणो ये च बहिः कुर्युर्बहिश्चराः ॥ २६ ॥
स्थान-विशेष पर चोर के विद्यमान होने का पक्का निश्चय हो जाने पर
चाण्डाल और व्याध-जैसों को ग्राम-जनपदों के भीतर घुसाकर तथा गांव के बाहर
दिन में तथा रात को चौकीदारी (चौकसी) करने वालों को गांव के बाहर सतर्क
करके आततायी भगोड़े चोरों को दबोच लेना चाहिए।
स्तेनेष्वलभ्यमानेषु राजा दद्यात् स्वकाद् गृहात् ।
उपेक्षमाणो ह्येवस्वी धर्मादर्थाच्च हीयते ॥ २७ ॥
चोरों को ढूंढ पाने में असमर्थ राजा (प्रशासन) को लुटे व्यक्ति की हानि की
भरपाई निजी सम्पत्ति से करनी चाहिए। इसका अर्थ है कि राजा को चोरों की धर
पकड़ को अत्यन्त गम्भीरता से लेना चाहिए। चोरों की उपेक्षा करने वाला राजा न
केवल आर्थिक हानि उठाता है, अपितु धर्म से च्युत तथा प्रजा में अलोकप्रिय भी
होता है।
॥ चतुर्थ अध्याय का चतुर्दश प्रकरण समाप्त ॥
242 / नारदस्मृति