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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 23 of 304

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टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार प्रत्येक मुक़दमे के प्रक्रियागत
चार चरण होते हैं—
उद्घाटन—वादी-प्रतिवादी मुक़दमे का प्रारम्भ करते हैं।
प्रतिष्ठापन—साक्षी मुक़दमे को स्थिरता प्रदान करते हैं।
निभालन—न्यायाधिकरण के सदस्य युक्ति-प्रत्युक्ति की जांच-परख करते
हैं और अपने-अपने मत प्रस्तुत करते हैं।
निर्णय-विज्ञापन—न्यायाधीश (राज-प्रतिनिधि) निर्णय घोषित करता है।
इस प्रकार मुक़दमा चतुष्पाद और चतुर्व्यापी है।
धर्मस्यार्थस्य यशसो लोकपङ्क्तेस्तथैव च।
चतुर्णां करणादेषां चतुष्कारीति चोच्यते ॥ 14 ॥
मुक़दमा चतुष्कारी—चार उपकार करने वाला—है। वह धर्म व अर्थ की
रक्षा, यश का प्रसार और लोगों के पारस्परिक अनुराग में वृद्धि करता है।
अन्याय के विरुद्ध न्याय का संरक्षण धर्म की रक्षा है। प्रायः प्रत्येक मुक़दमा
किसी-न-किसी रूप में धन-सम्पत्ति से जुड़ा होता है। धन हड़पने वाले से पीड़ित
को धन लौटवाना अर्थ की रक्षा है। मुक़दमा जीतने वाला लोक में सम्मानित होता
है, उसका यश बढ़ता है। मुक़दमे के भय से लोग एक-दूसरे से द्रोह नहीं करते,
स्नेह-भाव से रहते हैं। इस प्रकार मुक़दमा चार प्रकार से लोगों का हित-साधन
करता है।
राजा सत्पुरुषः सभ्याः शास्त्रं गणकलेखकौ।
हिरण्यमग्निरुदकमष्टाङ्गः समुदाहृतः ॥ 15 ॥
मुक़दमे के आठ अंग इस प्रकार हैं—आचारनिष्ठ राजा अथवा राजा द्वारा
नियुक्त-मनोनीत न्यायाधीश, न्यायाधिकरण (ज्यूरी) के सदस्य, शास्त्र, अर्थात्
न्यायसंहिता (पैनलकोड), गणक (लेखाधिकारी), लेखक, हिरण्य, अर्थात् स्वर्ण
(कोर्ट-फ़ीस), अग्नि और जल।
टिप्पणी—(1) आज न्यायालय में जिस प्रकार वक्तव्य से पूर्व वादी-
प्रतिवादी को गीता, क़ुरान अथवा बाईबल पर हाथ रखवा कर शपथ दिलायी जाती
है, प्राचीनकाल में अपने वक्तव्य से पूर्व हाथ में जल लेकर, सत्यभाषण की शपथ
ली जाती थी और सत्य की परीक्षा के लिए अग्नि में हाथ डाला जाता था। ऐसी
मान्यता है कि सत्यवक्ता के लिए अग्नि शीतल हो जाती थी और इसके विपरीत
मिथ्याभाषी के लिए दाहक हो जाती थी।
इसी सन्दर्भ में आठ अंगों में जल और अग्नि परिगणित हैं।
(2) असहाय भाष्यकार ने हिरण्य को हिरण्यगर्भ (ब्रह्म) का प्रतीक मानते
हुए हिरण्य, जल और अग्नि को प्रत्यक्ष देवता के रूप में ग्रहण किया है। उनके
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