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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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स्वैरिणी, यदि धन देकर ली-दी जाती हैं, तो ऐसी गर्भवती स्त्रियों से उत्पन्न होने
वाली सन्तान उत्पादक की होती है। इसके विपरीत बिना शुल्क लिये-दिये विवाह
करने वाली स्त्रियों की सन्तान पर वीर्य का आधान करने वाले के स्थान पर क्षेत्र के
स्वामी बने पुरुष का ही अधिकार होता है।
क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं क्षेत्रे बीजं प्रदीयते।
न तत्र बीजिनां भागः क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 55 ॥
वीर्याधान करने वाले किसी भी पुरुष को स्त्री द्वारा गर्भधारण करने की
जानकारी होने अथवा न होने पर उत्पन्न सन्तान पर एकमात्र पति का अधिकार
होता है, दूसरे पुरुष-यार या द्वितीय पति आदि का नहीं।
अभिप्राय यह है कि महत्त्व वीर्य का नहीं, क्षेत्र (स्त्री, भग) के स्वामित्व का
है। बीज किसका है—यह विवादास्पद हो सकता है, परन्तु खेत पर स्वामित्व
किसका है—यह तो निश्चित तथ्य होता है।
ओघवाताहृतं बीजं क्षेत्रे यस्य प्ररोहति।
फलभुक्तस्य तत् क्षेत्रं न बीजी फलभाग्भवेत्॥ 56 ॥
जिस प्रकार ऊपर से अपने खेत में फेंका गया बीज उड़कर दूसरे के खेत में
जा पड़ता है, तो उस बीज से उत्पन्न उपज पर खेत के स्वामी का अधिकार होता
है, बीज के स्वामी का नहीं, उसी प्रकार वीर्य का आधान करने वाले पुरुष का नहीं,
अपितु गर्भ धारण करने वाली स्त्री के स्वामी का ही उत्पन्न सन्तान पर अधिकार
होता है।
महोक्षो जनयेद्वत्सान्यस्य गोषु व्रजे चरन्।
तस्य ते यस्य ता गावो मोघं स्पन्दितमार्षभम्॥ 57 ॥
एक अन्य उदाहरण द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन
है कि जिस प्रकार किसी का वृषभ किसी दूसरे के घर, गोष्ठ अथवा क्षेत्र में खड़ी-
विचरण करती गाय से मैथुन कर उसे गर्भवती बनाता है और उस गाय से उत्पन्न
होने वाली सन्तान पर गाय के स्वामी ही अधिकार होता है, वृषभ के स्वामी का
नहीं—वृषभ का प्रयास केवल यौनतृप्ति माना जाता है—उसी प्रकार पर स्त्री से
भोग करने वाला केवल यौन-सुख का आनन्द लेता है, सन्तान का स्वामित्व प्राप्त
नहीं कर सकता।
क्षेत्रिकानुमते बीजं यस्य क्षेत्रे समर्प्यते।
तदपत्यं द्वयोरेव बीजिक्षेत्रिकयोर्मतम्॥ 58 ॥
क्षेत्र के स्वामी की अनुमति से उसके क्षेत्र में बीज वपन करने पर दोनों—क्षेत्र
के स्वामी और वपनकर्ता—का क्षेत्र में उत्पन्न उपज (सन्तान) पर समान अधिकार
होता है।
नारदस्मृति / 209