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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 21 of 304

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धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन को निम्नोक्त रूप से परिभाषित किया गया
है—
धर्म—प्रतिवादी द्वारा अपने ऊपर वादी द्वारा लगाये गये आरोप को स्वीकार
करना। किसी प्रकार से उसका खण्डन अथवा उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क न करना,
अर्थात् समर्पण करना, अपने को अपराधी मान लेना और दण्ड ग्रहण करने को
प्रस्तुत होना।
व्यवहार—वादी द्वारा लगाये गये आरोप को प्रतिवादी द्वारा नकारना और
साक्षियों द्वारा वादी के कथन की पुष्टि होना।
चरित्र—वादी द्वारा प्रस्तुत विषय की पुष्टि के लिए लिखित प्रमाण की
अपेक्षा करना।
शासन—राजा द्वारा दिया गया निर्णय।
टिप्पणी—नारदजी ने इन चारों में—'उत्तरः पूर्वबाधकः' कहा है, अर्थात्
धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से भी राजा को और देश को
प्रबल माना है, परन्तु हमारे विचार में तो यह उलटी गंगा बहाना है। जहां प्रतिवादी
अपने ऊपर लगाये गये आरोपों का विरोध ही नहीं करता, दण्ड के लिए अपने को
प्रस्तुत कर देता है, उससे उत्तम स्थिति भला और क्या हो सकती है ? यहां न तो
साक्ष्य की, न लिखित प्रमाण की और न ही राजा (न्यायाधिकरण) के हस्तक्षेप की
आवश्यकता है। यह तो सर्वोत्तम स्थिति मान्य होनी चाहिए। हां, सत्य को नकारने
पर साक्ष्य का और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित प्रमाण का सापेक्ष महत्त्व अवश्य है।
राजाज्ञा तो सदैव अन्तिम रूप से सर्वमान्य रही है। इस प्रकार धर्म को नकारने पर
ही तीनों की भूमिका प्रारम्भ होती है, धर्मपालन करने पर तो इनकी आवश्यकता ही
नहीं पड़ती।
असहाय भाष्यकार ने इन चारों—धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन—को इस
प्रकार परिभाषित किया है—
धर्म—उत्तमर्ण और अधमर्ण (ऋण देने-लेने वाले) द्वारा एकान्त में लेन-
देन करने पर भी दोनों का सत्य से विचलित न होना, अर्थात् ऋणकर्ता लिये गये
ऋण से मुकरता तो नहीं है, परन्तु दे पाने में अपनी असमर्थता को प्रकट करता है।
व्यवहार—दोनों—धनिक और ऋणकर्ता—द्वारा किसी भी समय, किसी के
मन में, किसी प्रकार के दोष के आ जाने की आशंका से बचने के लिए, किसी
विश्वस्त व्यक्ति को साक्षी के रूप में मध्यस्थ बनाकर लेन-देन करना।
चरित्र—दोनों—लेन-देन करने वालों—द्वारा निर्धारित शर्तों और लेन-देन
की राशि आदि को काग़ज़, भोजपत्र, वस्त्र अथवा काष्ठखण्ड पर अंकित करना।
शासन—न्यायालय-परिसर में जाकर अधिकृत लेखक (अर्जीनवीस यानी
नारदस्मृति / 19