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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 200 of 304

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  1. रोग विकार—किसी रोग के कारण पुंसत्व का नष्ट हो जाना।
  2. दैवी प्रकोप—किसी देवता के प्रकोप से पुंसत्व गंवा बैठना।
  3. ईर्ष्याषण्ढ—स्त्रियों के प्रति विद्वेष, हीनभावना अथवा घृणा आदि के
    कारण उत्तेजना खो देना।
  4. हीनता-ग्रस्त—स्त्रियों की सेवा करने से उन्हें भोगने में अरुचि,
    असामर्थ्य, भय, लज्जा एवं बेचैनी अनुभव करना।
  5. वातरेता—सम्भोग में प्रवृत्त होते ही वीर्य का स्खलित हो जाना।
  6. मुखेभग—भग में लिंग प्रवेश से भयभीत और मुख-मैथुन अथवा
    गुदा-मैथुन में रुचि रखना—एक प्रकार के अन्धविश्वास (वहम) का शिकार।
  7. आक्षिज—सम्भोग करने पर भी वीर्यपात न कर पाना। वीर्य का न
    निकलना।
  8. मोघबीज—वीर्य में सन्तानोत्पादक शुक्राणुओं का अभाव।
  9. शालीन—स्त्री संसर्ग के समय लिंग का उत्थित-उत्तेजित ही न होना।
  10. अन्यापति—अपनी पत्नी से भोग करने में असमर्थ, उसके सामने
    उत्तेजित न होने वाला, परन्तु दूसरी स्त्रियों से भोग करने में सफल।
    तत्राद्यावप्रतीकारौ पक्षाख्यो मासमाचरेत्।
    अनुक्रमात्तु यस्यान्य कालः सम्वत्सरः स्मृतः ॥ 14 ॥
    उपर्युक्त चौदह प्रकार के नपुंसकों में से प्रथम दो—लिंगविहीन तथा श्मश्रु-
    विहीन—को तो सर्वथा असाध्य ही समझना चाहिए। इनकी तो कोई चिकित्सा ही
    नहीं है। पक्षषण्ढ की एक मास तक और दूसरे षण्ढों की एक साल तक चिकित्सा
    करके परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
    ईर्ष्याषण्ढादयोयेऽन्ये चत्वारः समुदाहृताः ।
    त्यक्तव्यास्ते पतितवत् क्षतयोन्या अपि स्त्रिया ॥ 15 ॥
    यद्यपि नारी विद्वेष, नारी सेवा, वातरेता तथा मुत्स्वेभग आदि नपुंसकों की
    स्थिति में अनुकूल परिवेश, उपयुक्त चिकित्सा, सहानुभूति तथा मनोवैज्ञानिक उपचार
    आदि अपनाकर सुधार लाया जा सकता है, तथापि इन्हें पतितों के समान समझकर
    त्याग देना चाहिए; क्योंकि इनकी मानसिकता को स्थायी रूप में बदलना कदापि
    सम्भव नहीं। कुण्ठाग्रस्त व्यक्ति कभी सफल सम्भोग नहीं कर पाता।
    अक्षिममोघबीजाभ्यां कृतेऽपि प्रतिकर्मणि।
    पतिरन्यः स्मृतो नार्या वत्सरार्धं प्रतीक्ष्य तु ॥ 16 ॥
    विवाह करने पर पत्नी के साथ सम्भोग-क्रिया में लिंग उत्थित न कर पाने
    वाले (उत्तेजनाविहीन) तथा शीघ्रपात के रोगी और सन्तानोत्पत्ति के लिए अपेक्षित
    शुक्राणुओं से हीन वीर्य वाले पति को उपचार, चिकित्सा आदि के लिए छह महीने
    198 / नारदस्मृति