Skip to content
SarvaKosh
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 191 of 304

Read in context
Page 191

यदि अपने क्षेत्र में उत्पन्न वृक्षों की शाखाएं भी दूसरे के स्वामित्व वाले क्षेत्र
में चली जाती हों, तो उन शाखाओं पर लगने वाले फलों पर वृक्ष के स्वामी के
स्थान पर क्षेत्र के स्वामी का अधिकार होता है।
अवस्करस्थलश्वभ्रभ्रमस्यन्दैनिकादिभिः ।
चतुष्पथसुरस्थानरथ्यामार्गान्न रोधयेत् ॥ 15 ॥
घर का कचरा, मल-मूत्रादि तथा घर की छत पर गिरने वाले पानी के
निकासी की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे देवालय, गली, यातायात का
मार्ग (सड़क), गड्ढा, मण्डप तथा चौराहे आदि में किसी प्रकार का गतिरोध अथवा
अव्यवस्था न आ सके और न ही दुर्गन्ध आदि से वातावरण दूषित हो।
रोधायन्ति तु ये मोहाद्बलाद्वापि कथञ्चन ।
दण्डयेत्तादृशान् राजा साहसेनोत्तमेन च ॥ 16 ॥
अहंकार अथवा मूर्खता अथवा दुराग्रहवश अपने घर के कूड़े-करकट, गन्दगी
और दूषित जल से सार्वजनिक मार्ग, राजपथ तथा गली आदि में गतिरोध उत्पन्न
करने वाले तथा वातावरण को दूषित-मलिन करने वाले गृहस्वामी को प्रशासन
द्वारा दण्ड देकर अनुशासित करना चाहिए।
परक्षेत्रस्य मध्ये तु सेतुर्न प्रतिषिध्यते ।
महागुणोऽल्पबाधश्च वृद्धिरिष्टा क्षये सति ॥ 17 ॥
दूसरे के क्षेत्र में सेतु-निर्माण से उस क्षेत्र के स्वामी को होने वाली हानि की
अपेक्षा आस-पास के क्षेत्र वालों को अधिक लाभ मिलने की सम्भावना होने पर
सेतु-निर्माण का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता; क्योंकि यहां एक की साधारण
हानि के बदले, बहुतों को उपज में वृद्धि के रूप में भारी लाभ मिलने वाला है।
राज्य 'बहुजन हिताय' तथा 'बहुजन सुखाय' होता है।
सेतुस्तु द्विविधः प्रोक्तः खेयो बन्ध्यस्तथैव च।
तोयप्रवर्तनात् खेयो बन्ध्यः स्यात्तन्निवर्तनात् ॥ 18 ॥
सेतु दो प्रकार का होता है—1. खेय तथा 2. बन्ध्य। पानी के आने-जाने की
समुचित व्यवस्था के रूप में बनाया जाने वाला सेतु 'खेय' कहलाता है और पानी
के बहाव को एकदम रोकने के लिए बनाया जाने वाला सेतु 'बन्ध्य' कहलाता है।
नान्तरेणोदकं सस्यं नश्येदभ्युदकेन तु।
य एवानुदके दोषः स एवाभ्युदके स्मृतः ॥ 19 ॥
जिस प्रकार जल के बिना उपज नहीं हो सकती, उसी प्रकार अधिक जल आ
जाने से उपज नष्ट हो जाती है। इस प्रकार दोनों—जल का अभाव और जल की
आवश्यकता से अधिकता-कृषि-उपज के लिए हानिकारक होती है। इन दोनों
नारदस्मृति / 189