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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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का आयोजन आदि-के लिए राज्य से पूर्व अनुमति अवश्य लेनी चाहिए। बिना
शासकीय अनुमति के इन संगठनों द्वारा किसी प्रकार की सम्पत्ति रखना तथा किसी
प्रकार के समारोह का आयोजन करना दण्डनीय अपराध है।
नानुकूलं यद्राज्ञः प्रकृत्यवमतं च यत्।
बाधकं च यदर्थानां ततेभ्यो विनिवर्तयेत् ॥ ४॥
राजा को अपने लिए अनुकूल, प्रजा के लिए हितकर तथा आर्थिक विकास
के लिए लाभप्रद प्रतीत न होने वाली किसी भी सम्प्रदाय की, किसी भी गतिविधि
को तत्काल प्रतिबन्धित कर देना चाहिए। प्रशासन को केवल स्वस्थ, स्वच्छ,
साम्प्रदायिकता से मुक्त, देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाली गतिविधियों
को ही चलने की अनुमति देनी चाहिए।
मिथः संघातकरणमहिते शस्त्रधारणम्।
परस्परोपघातं च तेषां राजा न मर्षयेत् ॥ ५॥
राजा को बिना किसी उद्देश्य अथवा प्रयोजन-विशेष के निरर्थक संगठन
बनाने वाले दलों अथवा व्यक्तियों, प्रजा में आतंक फैलाने के लिए शस्त्रास्त्र धारण
करने वालों तथा एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते रहने वाले समुदायों (आजकल
अकाली निरंकारी, मुसलमानों में शिया-सुन्नी) के विरुद्ध तत्काल कठोर एवं उग्र
कार्यवाही करनी चाहिए। इस प्रकार के अशान्ति एवं अराजकता फैलाने वाले
संगठनों एवं व्यक्तियों को कठोरता से कुचल देना चाहिए। इनके प्रति थोड़ी-सी भी
लापरवाही का अत्यन्त भयंकर परिणाम निकलता है।
पृथग् गणांश्च ये भिन्द्युस्ते विनेया विशेषतः।
आवहेयुर्भयं घोरं व्याधिवत्ते ह्युपेक्षिताः ॥ ६॥
राजा को अपने गणों संगठनों से अलग होकर अशान्ति और उपद्रव फैलाने
वाले उद्दण्ड व्यक्तियों को यथाशीघ्र दण्डित करके अनुशासित करना चाहिए।
उनकी थोड़ी सी उपेक्षा भी, रोग की उपेक्षा से उसके भयंकर रूप धारण करने के
समान, राष्ट्र के लिए जटिल समस्या बन जाती है।
दोषवत् करणं यत् स्यादानाम्नायप्रकल्पितम्।
प्रवृत्तमपि तद्राजा श्रेयस्कामो निवर्तयेत् ॥ ७॥
प्रजा के शुभचिन्तक एवं राष्ट्र की शान्ति व सुरक्षा के प्रति समर्पित राजा को
शास्त्र में अनिर्दिष्ट, परन्तु देश के हित के विरुद्ध किसी भी कार्य अथवा गतिविधि
पर नियन्त्रण लगाना चाहिए। राजा को अपने विवेक से अनुकूल प्रतिकूल तथा
साधक-बाधक का निर्णय करके अनुकूल को विकसित होने का अवसर जुटाना
चाहिए तथा प्रतिकूल पर कुठाराघात करना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का दशम प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 185