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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 173 of 304

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Page 173

धूर्तों द्वारा लूट-पाट करना आदि-की पूर्ति का दायित्व चालक का ही होता है।
चालक को सवार के नष्ट द्रव्य का भुगतान करना ही होता है।
गवां शताद्वत्सतरी धेनुः स्याद्द्विशताद् भृतिः।
प्रति संवत्सरं गोपे सन्दोहश्चाष्टमेऽहनि ॥ 10 ॥
एक सौ गायों को एक वर्ष तक चराने-दिन-भर वन में घुमाने के पारिश्रमिक-
के रूप में ग्वाले को दूध देने वाली एक युवा गाय देनी चाहिए। दो सौ गायों को पूरा
वर्ष चराने का शुल्क बछड़े समेत एक स्वस्थ-पुष्ट गाय है। इस प्रकार आठ दिनों
तक गाय को दोहने का शुल्क आठवें दिन का दुग्ध है।
उपानयेद् गां गोपाय प्रत्यहं रजनीक्षये।
चीर्णाः पीताश्च ता गोपः सायाह्ने प्रत्युपानयेत् ॥ 11 ॥
गोपाल को प्रतिदिन गायों के स्वामी से गायों को लेकर उन्हें वन में घुमाना
चाहिए। दोपहर में गायों को भोजन और पानी आदि पिलाना और सायंकाल वापस
पहुंचाना चाहिए।
सा चेद् गौर्व्यसनं गच्छेद्व्यायच्छेत्तत्र शक्तितः।
अशक्तस्तूर्णमागत्य स्वामिने तन्निवेदयेत् ॥ 12 ॥
गोचारण के समय किसी गाय के विपत्तिग्रस्त-घायल होना, गड्ढे में गिरना,
हिंसक सिंह-व्याघ्र आदि का शिकार बनना अथवा किसी विषैले जन्तु द्वारा काटा
जाना आदि-होने पर अपनी शक्ति के अनुसार उसकी रक्षा, उपचार आदि करना
गोपाल का धर्म एवं दायित्व है। स्थिति गम्भीर होने पर गोपाल द्वारा गाय के स्वामी
को यथाशीघ्र सूचित करना चाहिए और अस्वस्थ गाय उसके स्वामी को लौटा देनी
चाहिए।
अव्यायच्छन्नविक्रोशन् स्वामिने चानिवेदयन्।
वोढुमर्हति गोपस्तां विनयं चापि राजनि ॥ 13 ॥
विपत्तिग्रस्त गाय की सेवा-शुश्रूषा न करने वाले तथा गाय के स्वामी को
सूचित न करने वाले, अर्थात् पूर्णतः उदासीन गोपालक से गाय के मूल्य की राशि
(एक सौ रुपया, आजकल तीन-चार हजार रुपया) क्षति-पूर्ति के रूप में वसूल
करनी चाहिए तथा प्रशासन द्वारा उसे दण्ड-जेल, कोड़े लगाना अथवा कठोर श्रम
कराना आदि-भी देना चाहिए।
नष्टंविनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम्।
हीनं पुरुषकारेण पालएव निपातयेत् ॥ 14 ॥
गाय के खो जाने पर, सर्पादि द्वारा काटने अथवा कुत्तों द्वारा घायल किये जाने
पर तथा उसका यथोचित एवं यथाशीघ्र उपचार न किये जाने से मर जाने पर
गोपालक को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है।
नारदस्मृति / 171