नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextगृहे जातस्तथा क्रीतो लब्धो दायादुपागतः ।
अनाकालभृतो लोके आहितः स्वामिना च यः ॥ २६ ॥
मोक्षितो महतश्चर्णात् प्राप्तो युद्धात् पणे जितः ।
तवाहमित्युपगतः प्रव्रज्यावसितः कृतः ॥ २७ ॥
भक्तादासश्च विज्ञेयस्तथैव वडवाहृतः ।
विक्रेता चात्मनः शास्त्रे दासाः पञ्चदश स्मृताः ॥ २८ ॥
शास्त्रों में दासों के निम्नोक्त पन्द्रह प्रकार बताये गये हैं- 1. घर के दास-दासी
से उत्पन्न, 2. क्रीत, अर्थात् ख़रीदा गया, 3. लाभ के रूप में प्राप्त, अर्थात् व्यापार
आदि में नक़दी के बदले मिला, 4. दाय के रूप में पितृ-परम्परा से प्राप्त, 5. दुर्भिक्ष
आदि में पाला गया, सहारा दिया गया, 6. किसी के द्वारा बन्धक रखा गया, 7. भारी
ऋण से मुक्त कराया गया, अर्थात् प्रत्युपकार के रूप में आया हुआ, 8. युद्ध में
पराजित राजा से छीना गया अथवा बन्दी बनाया गया, 9. अपनी आवश्यकतावश
शरण में आया हुआ, 10. संन्यास आश्रम से भ्रष्ट, 11. निश्चित समय के लिए
अनुबन्धित, 12. पूरा जीवन अपने भरण-पोषण के बदले घर में सेवा करने वाला,
13. दासी द्वारा अपने साथ लाया गया, 14. शर्त में जीता गया तथा 15. अपने को
बेचने वाला।
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दासत्वान्न विमुच्यते ।
प्रसादाद्धनिनोऽन्यत्र दास्यमेषां क्रमागतम् ॥ २९ ॥
उपर्युक्त पन्द्रह प्रकार के दासों में प्रथम चार- 1. घर में उत्पन्न, 2. क्रीत,
3. लाभ के रूप में प्राप्त तथा 4. दाय के रूप में प्राप्त वंशानुगत होने से स्वामी से
प्रसन्न हो जाने पर भी, अर्थात् उसके चाहने पर भी दासत्व से मुक्त नहीं हो सकते।
यश्चैषां स्वामिनं कश्चिन्मोक्षयेत् प्राणसंशयात् ।
दासत्वात् स विमुच्येत पुत्रभागे लभेत च ॥ ३० ॥
अपने प्राणों को संकट में डालकर, स्वामी के प्राणों की रक्षा करने वाला दास
न केवल दासत्व से मुक्त हो जाता है, अपितु स्वामी का पुत्रतुल्य होकर उसकी
सम्पत्ति के भाग को पाने का अधिकारी भी बन जाता है।
अनाकालभृतो दास्यान्मुच्यते गोयुगं ददत् ।
संरक्षितं यद्दुर्भिक्षं न तच्छुष्येत कर्मणा ॥ ३१ ॥
अकाल में पाला-पोसा जाने से दास बना व्यक्ति दीर्घकाल तक स्वामी की
सेवा करने पर भी दासत्व से मुक्त नहीं हो सकता है। हां, सामर्थ्य जुटाने पर गाय
बैल आदि देकर मुक्ति-लाभ कर सकता है।
आहितोऽपिधनं दत्वा स्वामी यद्येनमुद्धरेत् ।
अथोपगमयेदेनं स विक्रीतादनन्तरः ॥ ३२ ॥
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