नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextस्रोतोवहेव सर्वत्र विद्या निम्नानुसारिणी।
निम्नवर्ती श्रवेत्तस्मात्तदर्थी सर्वदा गुरोः ॥ 12 ॥
जिस प्रकार नदी का जल सदैव नीचे की ओर प्रवाहित होता है, उसी प्रकार
विद्या भी सदैव विनम्र व्यक्ति को प्राप्त होती है। अतः विद्यार्थी को उद्देश्य-सिद्धि के
लिए सदैव ही गुरु के प्रति विनम्र एवं विनत बने रहना चाहिए। तब ही वह विद्या
में प्रवीणता प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना सकता है।
अनुशास्यश्च गुरुणा न चेदनुविधीयते।
अविधिनाथवा बद्ध्वा रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥ 13 ॥
शिष्य के धृष्ट, अविनीत तथा अनुशासनहीन होने पर उसे अनुशासित करना,
सही मार्ग पर लाना, दिशा निर्देश देना गुरु का कर्तव्य-कर्म है। इसके लिए भले ही
गुरु को शिष्य की डण्डे से पिटाई करनी पड़े अथवा रस्सी से बांधकर रखना पड़े,
यह सब करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः अपने शिष्य को सुसंस्कृत
करने के लिए गुरु द्वारा कठोर पग उठाना शिष्य के हित-साधन के निमित्त ही होता
है। इस सम्बन्ध में मनु का कथन दर्शनीय है-
सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।
अर्थात् गुरु विष-भरे हाथों से नहीं, अपितु अमृतमय हाथों से पिटाई करते
हैं। उनके द्वारा पिटाई करने का उद्देश्य शिष्य को सन्मार्ग पर लाना होता है।
भृशं न ताडयेदेनं नोत्तमाङ्गे न वक्षसि।
अनुशास्याय विश्वास्यः शास्यो राज्ञान्यथा गुरुः ॥ 14 ॥
गुरु को अपने शिष्य को अनुशासित करने के लिए उसकी पिटाई करते समय
उसके उत्तम अंगों-वक्ष के ऊपर के अंगों-ग्रीवा, मस्तक, सिर, कान, नाक, गला
आदि-पर कभी प्रहार नहीं करना चाहिए। ताड़ना का विधान केवल अनुशासनहीन
छात्र के लिए है और उसका उद्देश्य छात्र को सही मार्ग पर लाना है। अनावश्यक
एवं अनुचित रूप से छात्रों को दण्ड देने वाले अध्यापक को क्रूर मानकर प्रशासन
द्वारा दण्डित करना चाहिए।
समावृत्तश्च गुरवे प्रदाय गुरुदक्षिणाम्।
प्रनीयात् स्वगृहानेषा शिष्यवृत्तिरुदाहृता ॥ 15 ॥
शिष्य का यह कर्तव्य कर्म है कि उसे अपनी शिक्षा-समाप्ति पर अपने गुरु
को दक्षिणा से सन्तुष्ट करने के उपरान्त ही अपने घर को लौटना चाहिए।
स्वशिल्पमिच्छन्नाहर्तुं बान्धवानामनुज्ञया।
आचार्यस्य वसेदन्ते कालं कृत्वा सुनिश्चितम् ॥ 16 ॥
छात्र को अपने अभिभावकों, शुभचिन्तकों तथा बन्धु-बान्धवों से परामर्श
करके ही शिक्षा की शाखा विशेष-वैद्यक, विज्ञान, कला, वाणिज्य, अनुसन्धान,
नारदस्मृति / 163