नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextवृत्ति की दृष्टि से भिन्नता लिये हुए होते हैं, तथापि ये चारों एक दृष्टि से समान हैं।
वह समानता है—इन चारों का स्वामी के अधीन होना। शिष्य और अन्तेवासी जाति
से द्विज होते हैं। भृतक तथा अधिकर्मकृत शूद्र भी हो सकते हैं। इन चारों की
सामाजिक स्थिति की भिन्नता स्पष्ट है। शिष्य और अन्तेवासी गुरु की सेवा करते
हुए भी दास नहीं कहलाते, जबकि भृतक और अधिकर्मकृत दास कहला भी सकते
हैं और नहीं भी। शिष्य और अन्तेवासी वेतनभोगी नहीं होते, जबकि भृतक पारिश्रमिक
पाता है और अधिकर्मकृत वेतन अथवा भत्ता अथवा कमीशन पाता है। शिष्य और
अन्तेवासी गुरु की गुरुता के कारण उसके अधीन हैं और उसके प्रति श्रद्धा भाव
रखते हैं, परन्तु भृतक और अधिकर्मकृत को स्वामी के गुण, पद तथा सामाजिक
स्तर आदि से कुछ लेना-देना नहीं। उसे तो केवल उससे प्राप्त होने वाले धन और
उसके उदार व्यवहार से प्रयोजन है। शिष्य और अन्तेवासी को सामान्यतया शिक्षा-
समाप्तिकाल तक गुरु के पास रहना ही है। भृतक और अधिकर्मकृत का कार्यकाल
और स्थितिकाल तो अनिश्चित ही रहता है, वे जीवनपर्यन्त भी स्वामी के साथ जुड़े
रह सकते हैं तथा इसके विपरीत दूसरे दिन भी उसे छोड़कर जा सकते हैं।
इस प्रकार इन चारों में जाति सम्बन्धी, स्थिति सम्बन्धी, कर्म सम्बन्धी और
वृत्ति सम्बन्धी भिन्नता होते हुए भी एक अभिन्नता है—गुरु अथवा स्वामी की
वशवर्तिता—उसकी आज्ञापालन तत्परता। इस प्रकार उसकी अधीनता, दूसरे शब्दों
में अस्वतन्त्रता।
कर्मापि द्विविधं ज्ञेयमशुभं शुभमेव च।
अशुभं दासकर्मोक्तं शुभं कर्मकृता स्मृतम्॥ ५॥
सेवाकर्म दो प्रकार का कहा गया है—शुभ तथा अशुभ। दासकार्य—झाडू-
पोचा, बर्तन साफ़ करना, वस्त्र-प्रक्षालन, जूता-पॉलिश, तेल-मालिश तथा लकड़ी
चीरना-फाड़ना आदि छोटे कार्य—अशुभ कर्म हैं तथा शेष सभी कर्मचारियों का
सेवाकार्य शुभ कर्म है।
गृहद्वाराशुचिस्थानरथ्यावस्करशोधनम् ।
गुह्याङ्गा स्पर्शनोच्छिष्टविण्मूत्रग्रहणोज्झनम्॥ ६॥
इष्टतः स्वामिनश्चाङ्गोपस्थानमथोऽन्ततः।
अशुभं कर्म विज्ञेयं शुभमन्यदतः परम्॥ ७॥
अशुभ कर्मों का विवरण इस प्रकार है—1. गृहद्वार, अपवित्र स्थान, अपवित्र
मार्ग तथा अशुद्ध वस्तु का शोधन, 2. गृहस्वामी के गुप्त अंगों का स्पर्श,
3. उच्छिष्ट (जूठन) और मल-मूत्र को उठाकर घर से बाहर फेंकना तथा 4. स्वामी
की इच्छानुसार उसे इन्द्रिय सुख देना आदि इस प्रकार के सभी कर्म अशुभ हैं और
इनसे भिन्न अन्य कर्म शुभ हैं।
नारदस्मृति / 161