नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
DevanagariSanskritpublished304 pages
Page 160 of 304
Read in contextPage 160
अदत्त—अर्थात् दिया हुआ भी न दिये-जैसा—के निम्नोक्त सोलह भेद हैं—
- भय (धर्म का, दण्ड का या लोकलाज का भय) के कारण दिया गया
धन, 2. क्रोध—किसी के व्यवहार पर क्षुब्ध होकर, आवेश में आकर धन फेंकना, - शोक—स्त्री पुत्रादि की अकालमृत्यु पर विह्वल एवं विरक्त होकर सम्पत्ति का
त्याग कर देना, 4. रोग—किसी असाध्य रोग से पीड़ित और जीवन से निराश होने
की स्थिति में किसी को कुछ भी देने को बक देना, 5. उत्कोच—अपने किसी काम
को निकालने के लिए घूस देना, 6. परिहास—मज़ाक़ में ही किसी को कुछ देने को
बोल देना, 7. विनिमय—किसी वस्तु को लेने के बदले कुछ देने का वचन करना, - दानव्यत्यास—दूसरों को कुछ देता देखकर वास्तविक स्थिति की जांच किये
बिना ही भावावेश में आकर कुछ दे देना, 9. छल-कपट से दूसरों द्वारा धन
छीनना—सौ देकर हज़ार देना-बताना और वसूल करने की चेष्टा करना, - बालक द्वारा किया गया लेन-देन, 11. मूढ़, अर्थात् बुद्धिहीन व्यक्ति द्वारा दिया
गया, 12. अस्वतंत्र, अर्थात् दूसरों पर आश्रित व्यक्ति द्वारा प्रदत्त, 13. आर्त, अर्थात्
घर की निर्धनता, किसी रोग, संकट अथवा पारिवारिक कलह-द्वेष से दिया गया
धन, 14. मत्त—मदिरा आदि के प्रभाव से विवेकहीन बने व्यक्ति द्वारा दिया गया
धन 15. प्रयोजन-विशेष—नियुक्ति, स्थानान्तरण, सम्मान, पुरस्कार आदि लाभ के
लिए लिया-दिया, परन्तु उस प्रयोजन का सिद्ध न होना।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार ने 'भय से दत्त को अदत्त' मानने का एक
सुन्दर उदाहरण निम्नोक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है—दुष्टेन साधुरटव्यां
प्राप्तोऽभिहितः। द्रम्माणां शतं ददासि ततो जीवसि अन्यथा म्रियसे। सोऽपि
भयाद्वदति दास्यामित्येवं भयप्रतिश्रुतमदत्तमिति विज्ञेयम्। अर्थात् एक दुष्ट किसी
सज्जन व्यक्ति को अकेले में पाकर उसे डराते हुए कहता है—तुम पर शनि भारी है,
यदि सौ दो सौ से पूजा नहीं करोगे, तो मर जाओगे। भला व्यक्ति उसके झांसे में
आकर देने का संकल्प कर लेता है—इस संकल्प को भी विवशता में किया होने के
कारण अव्यवहार्य माना जायेगा!
इसमें कुछ और भी जोड़ा जा सकता है। उदाहरणार्थ, लोभ को ही लीजिये।
कुछ धूर्त व्यक्ति स्वर्णाभूषणों को अथवा नक़दी को दुगुना करने का प्रलोभन देकर
व्यक्ति को लूट लेते हैं।
इसी प्रकार प्रसन्नता को भी लिया जा सकता है। कोई व्यक्ति किसी पर
प्रसन्न होकर अनपेक्षित धन पुरस्कार के रूप में दे देता है। कामवासना को भी इसी
प्रकार अदत्त ही मानना चाहिए। कामान्ध व्यक्ति अपनी किसी प्रेयसी अथवा वेश्या
को अन्धाधुन्ध धन लुटा देता है।
अभिप्राय यह है कि किसी भी असामान्य स्थिति में तथा अनुचित ढंग से
158 / नारदस्मृति