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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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  1. उदार-हृदय, 6. धनसमृद्ध तथा 7. लोक में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित।
    उपर्युक्त सात गुणों से युक्त पुरुष के पास निक्षिप्त सम्पत्ति समय बीतने पर भी
    सुरक्षित रहती है। उसे किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचती। निक्षेप्ता को चिन्ता
    नहीं करनी पड़ती।
    यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः।
    स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः॥ ३॥
    जिस व्यक्ति को, जिस स्थिति में और जिस प्रकार जो वस्तु निक्षेप के रूप में
    सौंपी जाती है, निक्षेप रखने वाले का कर्तव्य हो जाता है कि वह उस व्यक्ति को
    उस स्थिति में और उसी प्रकार से गृहीत वस्तु लौटा दे। दाय के अनुरूप ही ग्रहण
    का होना धर्म और न्याय है।
    न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं तु यथाविधि।
    उपसंगृह्य दाप्योऽसौ दिव्यादिभिर्व्यवस्थितः ॥ ४॥
    निक्षेप्ता से गृहीत वस्तु को ग्रहीता द्वारा यथावत् लौटाने से इनकार करने पर
    धर्माधिकारी द्वारा दिव्य उपायों के प्रयोग से ग्रहीता से सत्य उगलवाना चाहिए और
    निक्षेप्ता को उसकी वस्तु दिलवानी चाहिए।
    टिप्पणी—इस सम्बन्ध में मनु की व्यवस्था इस प्रकार है—
    अथ निक्षेपग्राही लोभं गच्छति, निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं न प्रयच्छति, तदावेदितो
    राज्ञा उपसंगृह्य दिव्यादिप्रमाणसाधितो द्विगुणदण्डाकोदितः कृतो दाप्यः।
    अर्थात् यदि निक्षेप रखने वाला धनिक लोभवश निक्षेप्ता की सम्पत्ति को
    हड़पना चाहता है और वस्तु के निक्षेप रखे जाने से मुकर जाता है और फिर पीडित
    व्यक्ति राजा से न्याय की गुहार करता है, तो राजा को दिव्य अथवा अदिव्य उपायों
    से सत्य का पता लगाना चाहिए। धनिक के दोषी पाये जाने पर न केवल उससे
    निक्षेप्ता की सम्पत्ति लेकर सम्बद्ध पक्ष को दिलानी चाहिए, अपितु व्यक्ति की धूर्तता
    के लिए दण्ड-रूप में उससे वस्तु के मूल्य से दुगुनी धनराशि भी वसूल करनी चाहिए।
    अन्यद्रव्यव्यवहितं द्रव्यमव्याहृतं च यत्।
    निक्षिप्यते परगृहे तदौपनिधिकं स्मृतम्॥ ५॥
    तालाबन्द बक्सा, पेटी, गठरी अथवा पैकेट—भीतर रखे सामान के विषय में
    जानकारी दिये बिना सोना है अथवा मिट्टी है—कुछ भी बताये बिना—निक्षेप के
    रूप में दूसरे के घर में रखे जाने को उपनिधि अथवा औपनिधिक निक्षेप नाम दिया
    जाता है।
    स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः साक्षिमानितरस्तथा।
    प्रतिदानं तथैवास्य प्रत्ययः स्याद्विपर्यये॥ ६॥
    निक्षेप दो प्रकार से किया जाता है। प्रथम, साक्षी की उपस्थिति में तथा
    नारदस्मृति / 147