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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 145 of 304

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Page 145

ग्रीष्मे तु सलिलं प्रोक्तं विषं काले सुशीतले।
ब्राह्मणस्य घटो देयः क्षत्रियस्याग्निरुच्यते ॥ 334 ॥
जल दिव्य का प्रयोग केवल ग्रीष्मकाल में और विष दिव्य का प्रयोग केवल
शीतकाल में ही करना चाहिए। ब्राह्मण के लिए घट दिव्य का तथा क्षत्रिय के लिए
अग्नि दिव्य का प्रयोग शास्त्र-सम्मत है।
वैश्यं तु सलिलं देयं विषं शूद्रे प्रदापयेत्।
न ब्राह्मणं विषं दद्यान्न लोहं क्षत्रियो हरेत् ॥ 335 ॥
ब्राह्मण को विष दिव्य और क्षत्रिय को लौह दिव्य कभी नहीं देना चाहिए।
वैश्य को जल दिव्य और शूद्र को विष दिव्य दिया जाता है।
कोशान्तानि तुलादीनि गुरुष्वर्थेषु दापयेत्।
शतार्धं दापयेच्छुद्धावशुद्धो दण्डभागभवेत् ॥ 336 ॥
बड़े पापों के मामलों में भी अभियुक्त द्वारा तुला दिव्य से कोश दिव्य तक
किसी दिव्य को अपनाने—अपने को उस दिव्य द्वारा निर्दोष सिद्ध करने का अवसर
प्रदान करने—का आग्रह करने पर उसे अवसर तो देना चाहिए, परन्तु यह स्पष्ट कर
देना चाहिए कि उसके शुद्ध-निर्दोष सिद्ध होने पर भी उसे वादी को एक सौ पचास
पणों का भुगतान करना पड़ेगा।
तण्डुलानां प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणचोदितम्।
चौर्ये तु तण्डुला देया नान्यत्रेति विनिश्चयः ॥ 337 ॥
अब हम तण्डुलों के सेवन से सम्बन्धित दिव्य विधि की जानकारी प्रस्तुत
कर रहे हैं। तण्डुल एकान्त में चोरी से दिये जाते हैं। तण्डुलों के आदान-प्रदान को
सार्वजनिक नहीं किया जाता है।
तण्डुलान् कारयेच्छुक्लाञ्छालेर्नान्यस्य कस्यचित्।
मृण्मये भाजने कृत्वा भास्करस्याग्रतः शुचिः ॥ 338 ॥
चावलों को भूसी से अलग और साफ़ सुथरा करके मिट्टी के पात्र में भर देना
चाहिए और उस पात्र को सूर्यदेव के सामने रख देना चाहिए।
स्नानोदकेन सम्पृक्तान् रात्रौ तत्रैव वासयेत्।
प्रभातायां रजन्यां तु त्रिः कृत्वा प्राङ्मुखाय च ॥ 339 ॥
रात्रि में स्नान करके व चावलों को शुद्ध करके जल में भिगोकर रख देना
चाहिए। प्रातःकाल उठकर पूर्वाभिमुख होकर उन्हें शुद्ध जल से तीन बार भली
प्रकार धोकर साफ़ करना चाहिए।
स्नानाय सोपवासाय दद्याद्देवार्चकः स्वयम्।
स्वयं कार्यं समुद्दिश्य सत्यासत्यपरीक्षणे ॥ 340 ॥
तण्डुल दिव्य करने वाले को स्नान आदि से शुद्ध होकर व उपवास रखकर
नारदस्मृति / 143