नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextसत्यं वाहनशस्त्राणि गोबीजकनकानि च।
देवतापितृपादांश्च दत्तानि सुकृतानि च ॥ 248 ॥
साक्ष्य सुलभ न होने पर अभियुक्त से सत्य उगलवाने के लिए वाहन, शस्त्र
आदि तथा गाय, बीज, कनक, देवता, पितर और सुकृत (पुण्य) आदि की शपथ
दिलानी चाहिए। इनका अभीष्ट परिणाम निकलता है—इसमें किसी प्रकार का
सन्देह नहीं।
महापराधे दिव्यानि दापयेत्तु महीपतिः ।
अल्पेषु तु नृपश्रेष्ठ शपथैः श्रावयेन्नरम् ॥ 249 ॥
राजाओं से जब कभी जाने अनजाने कोई महान् अपराध हो गया है, तो
उन्होंने पश्चात्ताप के रूप में देवों की आराधना की है, दिव्य प्रयोगों का आश्रय
लिया है और साधारण अथवा छोटा-मोटा अपराध हो जाने पर दुःख प्रकट करते
हुए भविष्य में ऐसा न करने की शपथ ली है।
इस प्रकार देवाराधन और शपथों से उन्हें विहित अपराधों के दण्ड-भोग से
निवृत्ति मिली है। अतः अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होकर प्रायश्चित्त भी
दण्ड-भोग का रूप बन जाता है।
टिप्पणी—महर्षि याज्ञवल्क्य ने निम्नोक्त को परमपवित्र मानते हुए इनकी
शपथ लेने का विधान किया है। झूठी शपथ लेने का अर्थ होता है—इनसे वञ्चित
होना, देवों के प्रकोप को आमन्त्रित करना तथा अपना सर्वनाश सुनिश्चित करना—
सत्यं वाहनमस्त्राणि गोबीजकनकानि च।
देवब्राह्मणपादांश्च पुत्रदारशिरांसि च॥
अर्थात् वाहन—रथ, अश्व, गज आदि, अस्त्र—धनुष, बाण, भाला आदि
गाय, बीज, स्वर्ण, देव, ब्राह्मण के चरण, पुत्र, पत्नी तथा अपने सिर की झूठी
क़सम कभी नहीं खानी चाहिए।
इत्येते शपथाः प्रोक्ता मनुना स्वल्पकारणे ।
पातकेऽष्टाभियोगे च विधिर्दिव्यः प्रकीर्त्तितः ॥। 250 ।।
मनु आदि स्मृतिकारों ने छोटे-मोटे अपराधों के लिए शपथों का विधान किया
है, अर्थात् भविष्य में ऐसा अपराध न करने की शपथ लेने को पर्याप्त माना है, परन्तु
बड़े तथा जान-बूझकर किये गये अपराधों में तो दिव्य प्रयोग—घोर प्रायश्चित्त—
का करना ही अपेक्षित है।
सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां प्रच्छन्नेषु विशेषतः ।
दैवं पञ्चविधं ज्ञेयमित्याह भगवान्मनुः ॥ 251 ॥
भगवान् मनु ने सन्दिग्ध, विशेषतः आपराधिक मामलों में, अभियुक्त से सत्य
उगलवाने तथा यथार्थ का पता लगाने के लिए निम्नोक्त पांच प्रकार के दिव्य उपाय
बतलाये हैं।
126 / नारदस्मृति