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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 126 of 304

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Page 126

यमन्तर्धारयन्त्यापो दीप्तोऽग्निर्न दहत्यपि।
शापयत्यभिशापं तं किल्विषी स्यादतोऽन्यथा॥ २४० ॥
असत्यवक्ता से कहना चाहिए—यदि तुम सत्य पर स्थित हो, तो अग्नि का
स्पर्श करो, अग्नि तुम्हें नहीं जलायेगी, जल हाथ में लो, जल स्थिर रहेगा, देवों को
साक्षी मानकर कहो, यदि तुम्हारा कथन सत्य होगा, तो तुम्हें उनका शाप उद्विग्न
नहीं करेगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो अथवा अग्नि आदि द्वारा जलाये जाते हो,
तो निश्चित है कि तुम पापी हो।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे।
न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया ॥ २४१ ॥
निर्जन वन में, रात के अन्धकार में तथा घर के भीतर अकेलेपन में किये गये
साहसिक बलात्कार—डाका, शीलहरण—आदि को उगलवाने के लिए तथा धरोहर
में रखी वस्तु को लौटाने के लिए दिव्य-क्रिया—अग्नि, जल, इन्द्र, वरुण तथा यम
आदि की शपथ दिलाना, मृत्यु के उपरान्त भीषण नरक-यातना झेलना आदि—का
प्रयोग करना चाहिए।
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु स्तेयसाहसयोरपि ॥
एष एव विधिर्दृष्टः सर्वार्थापह्नवेषु च ॥ २४२ ॥
इसी प्रकार स्त्रियों के शील-भंग, बलात्कार अथवा अपमान सम्बन्धी विवाद
में, चोरी-डकैती के अभियोग में तथा धरोहर को नकारने-हड़पने के व्यवहार में
दैवी प्रयोगों—सत्य न बोलने पर मरने के बाद अग्नि तुम्हारे देह को जलायेगी नहीं,
तुम्हें अन्न-जल सुलभ नहीं होगा, देवों का प्रकोप तुम्हारे वंश को लील लेगा,
दरिद्रता तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी, तुम्हें कोढ़ लग जायेगा आदि शपथों—का
प्रयोग करना चाहिए।
शपथा ह्यपि देवानाम्ऋषीणामपि च स्मृताः।
वसिष्ठः शपथं शेपे यातुधानेन शङ्कितः ॥ २४३ ॥
स्मृतियों के आधार पर शपथ लेने की प्रथा का देवों और ऋषियों में भी
प्रचलन सिद्ध होता है, अर्थात् ऋषि अपने को सत्यनिष्ठ सिद्ध करने के लिए शपथ
लेते थे तथा देव शपथ लेकर उच्चरित वचन की सत्यता पर पूर्ण विश्वास करते
थे—इतिहास इसका साक्षी है। एक समय जब एक राक्षस ने वसिष्ठजी को घेर
लिया था, तो उन्होंने इसी प्रकार शपथ—ऋषि का शाप तुम्हें अनन्तकाल तक
भटकाता रहेगा—देकर उसके अत्याचार से मुक्ति पायी थी।
अभिप्राय यह है कि दैवी उपायों का व्यक्ति पर अनुकूल और निश्चित प्रभाव
पड़ता है—इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है।
124 / नारदस्मृति