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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 92 of 770

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Page 92

९० * संक्षिप्त नारदपुराण *

दूधसे वामनजीको स्नान करावे। 'नमस्ते वामनाय'—
इस मन्त्रसे दूर्वा और घीकी एक सौ आठ आहुति
देकर रातमें जागरण और वामनजीका पूजन करे।
दक्षिणासहित दही, अन्न और नारियलका फल
वामनजीकी पूजा करनेवाले ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक
अर्पण करे। (मन्त्र इस प्रकार है—)

वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थो वामनः सदा।
वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः॥
(ना० पूर्व० १७। ६१)

'वामन बुद्धिदाता हैं। वे ही होता हैं और
द्रव्यमें भी सदा वामनजी स्थित रहते हैं। वामन
ही इस संसार-सागरसे तारनेवाले हैं। वामनजीको
बार-बार नमस्कार है।'

इस मन्त्रसे दही-अन्नका दान करके यथाशक्ति
ब्राह्मणोंको भोजन करावे। ऐसा करके मनुष्य सौ
अग्निष्टोम यज्ञोंका फल पा लेता है।

श्रावण मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको
उपवास करनेवाला व्रती मधुमिश्रित दूधसे भगवान्
श्रीधरको स्नान करावे और 'नमोऽस्तु श्रीधराय'—
इस मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि सामग्रियोंद्वारा
क्रमशः पूजन करे। मुने! तत्पश्चात् दही मिले हुए
घीसे एक सौ आठ आहुति दे। फिर रातमें
जागरण करके पूजाकी व्यवस्था करे और ब्राह्मणको
परम उत्तम एक आढक (चार सेर) दूध दान
करे। विप्रवर! साथ ही सम्पूर्ण कामनाओंकी
सिद्धिके लिये वस्त्र और दक्षिणासहित सोनेके दो
कुण्डल भी निम्नाङ्कित मन्त्रसे अर्पण करे।

क्षीराब्धिशायिन् देवेश रमाकान्त जगत्पते।
क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः॥
(ना० पूर्व० १७। ६७)

'क्षीरसागरमें शयन करनेवाले देवेश्वर!
लक्ष्मीकान्त! जगत्पते! इस दुग्धदानसे आप अत्यन्त
प्रसन्न हो सम्पूर्ण सुखोंके दाता होइये।'

ब्राह्मणभोजन सुख देनेवाला है, इसलिये व्रती
पुरुष यथाशक्ति भोजन करावे। ऐसा करनेसे एक
हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको
उपवास करके एक द्रोण (कलश) दूधसे जगद्गुरु
भगवान् हृषीकेशको स्नान करावे। 'हृषीकेश
नमस्तुभ्यम्' इस मन्त्रसे मनुष्य भगवान्‌का पूजन
करे। फिर मधुमिश्रित चरुसे एक सौ आठ
आहुति दे। फिर पूर्ववत् जागरण आदि कार्य
सम्पन्न करके आत्मज्ञानी ब्राह्मणको डेढ़ आढक
(छः सेर) गेहूँ और यथाशक्ति सुवर्णकी दक्षिणा
दे। (मन्त्र इस प्रकार है—)

हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे।
मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः॥
(ना० पूर्व० १७। ७२)

'इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् हृषीकेश! आप
सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र कारण हैं। आपको
नमस्कार है। इस गोधूम-दानसे प्रसन्न हो आप
मुझे सब प्रकारके सुख दीजिये।'

तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर
स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करनेवाला
पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो महान् यज्ञका फल
पाता है।

आश्विन मासकी शुक्ला द्वादशीको उपवास
करके पवित्र हो भक्तिपूर्वक भगवान् पद्मनाभको
दूधसे स्नान करावे। फिर 'नमस्ते पद्मनाभाय'—
इस मन्त्रसे यथाशक्ति तिल, चावल, जौ और
घृतद्वारा होम एवं विधिपूर्वक पूजन करे। रातमें
जागरणका कार्य सम्पन्न करके पुनः पूजन करे
और ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक पाव मधु दान
करे। (मन्त्र इस प्रकार है—)

पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह।
मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः॥
(ना० पूर्व० १७। ७७)

'सम्पूर्ण लोकोंके पितामह पद्मनाभ! आपको