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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 87 of 770

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Page 87
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
    ८५

होकर वे शीघ्र तुम्हारा कल्याण करेंगे।

मुनिश्रेष्ठ नारद ! तीनों लोकोंके स्वामी देवदेवेश्वर भगवान् अच्युत ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये। फिर वे राजा भगीरथ भी उठे। द्विजश्रेष्ठ ! राजाके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे— क्या यह सब स्वप्न था अथवा साक्षात् सत्यका ही दर्शन हुआ है। अब मैं क्या करूँ? इस प्रकार भ्रान्तचित्त हुए राजा भगीरथसे आकाशवाणीने उच्च स्वरसे कहा—'राजन् ! यह सब अवश्य ही सत्य है। तुम चिन्ता न करो।' आकाशवाणी सुनकर भूपाल भगीरथने हम सबके कारण तथा समस्त देवताओंके स्वामी भगवान् शिवका भक्तिपूर्वक स्तवन किया।

भगीरथने कहा—मैं प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले विश्वनाथ शिवको प्रणाम करता हूँ। जो प्रमाणसे परे तथा प्रमाणरूप हैं, उन भगवान् ईशानको मैं नमस्कार करता हूँ। जो जगत्स्वरूप होते हुए भी नित्य और अजन्मा हैं, संसारकी सृष्टि, संहार और पालनके एकमात्र कारण हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। योगीश्वर, महात्मा जिनका आदि, मध्य और अन्तसे रहित अनन्त, अजन्मा एवं अव्ययरूपसे चिन्तन करते हैं, उन पुष्टिवर्धक शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। पशुपति भगवान् शिवको नमस्कार है। चैतन्यस्वरूप भगवान् शंकरको नमस्कार है। असमर्थोंको सामर्थ्य देनेवाले शिवको नमस्कार है। समस्त प्राणियोंके पालक भगवान् भूतनाथको नमस्कार है। प्रभो! आप हाथमें पिनाक धारण करते हैं। आपको नमस्कार है। त्रिशूलसे शोभित हाथवाले आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूत आपके स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। जगत्के अनेक रूप आपके ही रूप हैं। आप निर्गुण परमात्माको नमस्कार है। ध्यानस्वरूप आपको नमस्कार है। ध्यानके साक्षी आपको नमस्कार है। ध्यानमें सम्यक् रूपसे स्थित आपको नमस्कार है तथा ध्यानसे ही अनुभवमें आनेवाले आपको नमस्कार है। जो अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले, महात्मा, परमज्योतिःस्वरूप तथा सनातन हैं, तत्त्वज्ञ पुरुष जिन्हें मानवनेत्रोंको प्रकाश देनेवाले सूर्य कहते हैं, जो उमाकान्त, नन्दिकेश्वर, नीलकण्ठ, सदाशिव, मृत्युञ्जय, महादेव, परात्पर एवं विभु कहे जाते हैं, परब्रह्म और शब्दब्रह्म जिनके स्वरूप हैं, उन समस्त जगत्के कारणभूत परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! आप जटाजूट धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। जिनसे समुद्र, नदियाँ, पर्वत, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध-समुदाय, स्थावर-जङ्गम, बड़े-छोटे, सत्-असत् तथा जड और चेतन—सबका प्रादुर्भाव हुआ है, योगी पुरुष जिनके चरणारविन्दोंमें नमस्कार करते हैं, जो सबके अन्तरात्मा, रूपहीन एवं ईश्वर हैं, उन स्वतन्त्र एक तथा गुणियोंके गुणस्वरूप भगवान् शिवको मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ, बार-बार मस्तक झुकाता हूँ।

सब लोगोंका कल्याण करनेवाले महादेव भगवान् शंकर इस प्रकार अपनी स्तुति सुनकर, जिनकी तपस्या पूर्ण हो चुकी है, उन राजा भगीरथके आगे प्रकट हुए। उनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। उन्होंने अर्धचन्द्रका मुकुट धारण कर रखा है। उनके तीन नेत्र हैं। एक-एक अङ्गसे उदारता टपकती है। उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत पहन रखा है। उनका वक्षःस्थल विशाल तथा कान्ति हिमालयके समान उज्ज्वल है। गजचर्मका वस्त्र पहने हुए उन भगवान् शिवके चरणारविन्द समस्त देवताओंद्वारा पूजित हो रहे हैं। नारदजी ! भगवान् शिवको इस रूपमें उपस्थित देख राजा भगीरथ उनके चरणोंके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। फिर सहसा