Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished770 pages

Page 752 of 770

Read in context
Page 752

७५० * संक्षिप्त नारदपुराण *

उन्होंने उन महर्षियोंकी बात सुनकर निश्चय किया कि साधु पुरुषोंकी रक्षा धर्मका कार्य है; अतः इसे करना चाहिये। तब अपने धनुष-बाण लेकर वे उन मुनियोंके साथ चले। महेन्द्र पर्वतसे उतरकर मुनियोंके साथ समुद्रके तटपर जा पहुँचे। वहाँ वक्ताओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा जल-जन्तुओंके स्वामी वरुणको सम्बोधित करके कहा—'प्रचेता वरुणदेव! मैं भृगुवंशी परशुराम मुनियोंके साथ एक विशेष कार्यसे यहाँ आया हूँ, दर्शन दीजिये; आपसे अत्यन्त आवश्यक काम है।' परशुरामजीके इस प्रकार पुकारनेपर उनकी बात सुनकर भी वरुणदेव अहंकारवश उनके समीप नहीं आये। इस प्रकार बार-बार परशुरामजीके बुलानेपर भी जब वे नहीं आये तब भृगुवंशी परशुरामने अत्यन्त कुपित होकर धनुष उठाया और उसपर अग्निबाण रखकर समुद्रको सुखा देनेके लिये उसका संधान किया। भद्रे! महात्मा परशुरामद्वारा उस आग्नेय अस्त्रके संधान करते ही जल-जन्तुओंसे भरा हुआ समुद्र क्षुब्ध हो उठा। परशुरामजीके उस अस्त्रकी आँचसे वरुण भी जलने लगे। तब भयभीत होकर वे प्रत्यक्षरूपसे वहाँ आये और उन्होंने परशुरामजीके दोनों पैर पकड़ लिये। यह देख परशुरामजीने अपना अस्त्र लौटा लिया और वरुणसे कहा—'तुम अपना सारा जल शीघ्र हटा लो जिससे भगवान् गोकर्णका दर्शन किया जाय।' तब परशुरामजीकी आज्ञासे वरुणने गोकर्ण-तीर्थका जल हटा लिया; परशुरामजी भी गोकर्णनाथ महादेवका पूजन करके फिर महेन्द्रपर्वतपर चले गये और वे ब्राह्मण ऋषि-मुनि वहीं रहने लगे। उन उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सम्पूर्ण महर्षियोंने वहाँ तपस्या करके पुनरावृत्तिरहित परम निर्वाणरूप मोक्ष प्राप्त कर लिया। उस क्षेत्रके प्रभावसे प्रसन्न होकर पार्वतीदेवी, भूतगण तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ भगवान् शङ्कर वहाँ नित्य निवास करते हैं।

विनयपूर्वक प्रणाम किया।

तदनन्तर भृगुवंशियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उन मुनियोंको आया देख अर्घ्य, पाद्य आदि सामग्रियोंसे उनका आदरपूर्वक पूजन किया। आतिथ्य ग्रहण करके जब वे सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये तब भृगुनन्दन परशुरामजीने उनसे कहा—'महाभाग महर्षिगण! आपका स्वागत है। आपलोग जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हुए हैं, उसे निर्भय होकर कहें। उसकी मैं पूर्ति करूँगा।' तब वे मुनिश्रेष्ठ जिस कार्यके लिये परशुरामजीके पास आये थे, उसे बताते हुए बोले—'भृगुश्रेष्ठ! आपको ज्ञात होना चाहिये कि हमलोग गोकर्णतीर्थमें निवास करनेवाले मुनि हैं। राजा सगरके पुत्रोंने पृथ्वी खोदकर हमें उस तीर्थसे बाहर निकाल दिया है। विप्रेन्द्र! अब आप ही अपने प्रभावसे समुद्रका जल हटाकर वह उत्तम क्षेत्र हमें देनेके योग्य हैं।'