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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 745
  • उत्तरभाग * ७४३

वर है।' मुनिके ऐसा कहनेपर भक्तोंको मनोवाञ्छित वर देनेवाले पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने उन्हें अपना सामीप्य प्रदान किया। भगवान् त्र्यम्बक उसी रूपसे वहीं निवास करने लगे। तभीसे वह पर्वत त्र्यम्बक कहलाने लगा। शुभगे! जो मानव भक्तिभावसे गोदावरी-गङ्गामें जाकर स्नान करते हैं, वे भवसागरसे मुक्त हो जाते हैं। जो लोग गोदावरीके जलमें स्नान करके उस पर्वतपर विराजमान भगवान् त्र्यम्बकका विविध उपचारोंसे पूजन करते हैं, वे साक्षात् महेश्वर हैं। मोहिनी! भगवान् त्र्यम्बकका यह माहात्म्य मैंने संक्षेपसे बताया है। तदनन्तर जहाँतक गोदावरीका साक्षात् दर्शन होता है, वहाँतक बहुत-से पुण्यमय आश्रम हैं। उन सबमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भद्रे ! गोदावरी कहीं प्रकट हैं और कहीं गुप्त हैं; फिर आगे जाकर पुण्यमयी गोदावरी नदीने इस पृथ्वीको आप्लावित किया है। मनुष्योंकी भक्तिसे जहाँ वे महेश्वरी देवी प्रकट हुई हैं, वहाँ महान् पुण्यतीर्थ है जो स्नानमात्रसे पापोंको हर लेनेवाला है। तदनन्तर गोदावरी देवी पञ्चवटीमें जाकर भलीभाँति प्रकाशमें आयी हैं। वहाँ वे सम्पूर्ण लोकोंको उत्तम गति प्रदान करती हैं। विधिनन्दिनि ! जो मनुष्य नियम एवं व्रतका पालन करते हुए पञ्चवटीकी गोदावरीमें स्नान करता है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जब त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ आकर रहने लगे, तबसे उन्होंने पञ्चवटीको और भी पुण्यमयी बना दिया। शुभे! इस प्रकार यह सब गौतमाश्रमका माहात्म्य कहा गया है।

पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जैमिनिद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति

मोहिनी बोली— गुरुदेव ! आपने जो गौतम-आश्रम तथा महर्षि गौतमका पवित्र उपाख्यान कहा है, उसे मैंने सुना। अब मैं पुण्डरीकपुरका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

पुरोहित वसुने कहा— महादेवजी भक्तोंके वशमें रहते हैं और उन्हें तत्काल वर देते हैं। वे भक्तोंके सम्मुख प्रकट होते और उनकी इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं। एक समयकी बात है, व्यासजीके शिष्य मुनीश्वर जैमिनि अग्निवेश्य आदि शिष्योंके साथ तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पुण्डरीकपुरमें गये जो साक्षात् देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान सुशोभित था। उस नगरकी शोभा देखकर महर्षि जैमिनि बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ सरोवरमें मुनिने स्नान करनेके पश्चात् संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण किया। फिर पार्थिव लिङ्गका निर्माण करके पाद्य, अर्घ्य आदि विविध उपचारोंसे विधिपूर्वक उसका पूजन किया। पूजनके समय उनका चित्त पूर्णतः शान्त था; मनमें कोई व्यग्रता नहीं थी। गन्ध, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे भलीभाँति पूजन करके ज्यों ही महर्षि जैमिनि स्थिर होकर बैठे त्यों ही प्रसन्न होकर भगवान् शिव उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये।

तदनन्तर जैमिनि साक्षात् भगवान् उमापतिको प्रकट हुआ देख उनके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये। फिर सहसा उठकर हाथ जोड़ शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा आधे अङ्गमें हरि और आधेमें हररूपसे प्रकट हुए भगवान् शिवसे बोले।

जैमिनिने कहा— देवदेव जगत्पते ! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आप ब्रह्मा आदिके भी