संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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बनवाना आदि कार्य पूर्त कहा जाता है। विशेषतः
बगीचा, किसी देवताके लिये बने हुए तालाब,
बावड़ी, कुआँ, पोखरा और देवमन्दिर—ये यदि
गिरते या नष्ट होते हों तो जो इनका उद्धार करता
है, वह पूर्त कर्मका फल भोगता है; क्योंकि ये
सब पूर्त कर्म हैं। सफेद गायका मूत्र, काली
गौका गोबर, ताँबेके रंगवाली गायका दूध, सफेद
गायका दही और कपिला गायका घी—इन सब
वस्तुओंको लेकर एकत्र करे तो वह पञ्चगव्य
बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होता है।
कुशोंद्वारा लाये हुए तीर्थ-जल और नदी-जलके
साथ उक्त सभी द्रव्योंको पृथक्-पृथक् प्रणवमन्त्रसे
लाकर प्रणवद्वारा ही उन्हें उठावे, प्रणव-जप करते
हुए ही उनका आलोडन करे और प्रणवके
उच्चारणपूर्वक ही पीये। पलाश वृक्षके बिचले
पत्तेमें अथवा ताँबेके शुभ पात्रमें अथवा कमलके
पत्तेमें या मिट्टीके बर्तनमें कुशोदकसहित उस
पञ्चगव्यको पीना चाहिये।
एक सूतकमें दूसरा सूतक उपस्थित हो जाय
तो दूसरेमें दोष नहीं लगता। पहले सूतकके साथ
ही उसकी शुद्धि हो जाती है। एक जननाशौचके
साथ दूसरा जननाशौच और एक मरणाशौचके
साथ दूसरा मरणाशौच भी शुद्ध हो जाता है। एक
मासके भीतर गर्भस्राव हो तो तीन दिनका
अशौच बताये। दो माससे ऊपर होनेपर जितने
महीनेमें गर्भस्राव हो, उतनी ही रात्रियोंमें उसके
अशौचकी निवृत्ति होती है। साध्वी रजस्वला स्त्री
रज बंद हो जानेपर स्नानमात्रसे शुद्ध होती है।
विवाहसे सातवें पदपर अर्थात् सप्तपदीकी क्रिया
पूरी होनेपर अपने पितृ-सम्बन्धी गोत्रसे च्युत हो
जाती है यानी उसके पतिका गोत्र हो जाता है;
अतः उसके लिये श्राद्ध और तर्पण पतिके गोत्रसे
ही करने चाहिये। पिण्डदानमें पति और पत्नी
दोनोंका उद्देश्य होता है; अतः प्रत्येक पिण्डमें दो
नामसे संकल्प होना चाहिये। तात्पर्य यह है कि
पिता या पितामह आदिको सपत्नीक विशेषण
लगाकर पिण्डदान करना चाहिये। इस प्रकार छः
व्यक्तियोंके लिये तीन पिण्ड देने योग्य हैं। ऐसा
दाता मोहमें नहीं पड़ता। माता अपने पतिके साथ
विश्वेदेवपूर्वक श्राद्धका उपभोग करती है। इसी
प्रकार पितामही और प्रपितामही भी अपने-अपने
पतिके ही साथ श्राद्ध-भोग करती हैं। प्रत्येक
वर्षमें माता-पिताका एकोद्दिष्टश्राद्धद्वारा सत्कार
करे। उस वार्षिक श्राद्धमें विश्वेदेवका पूजन नहीं
किया जाता। अतः उनके बिना ही वह श्राद्धभोजन
करावे। उसमें एक ही पिण्ड दे। नित्य, नैमित्तिक,
काम्य, वृद्धिश्राद्ध तथा पार्वण—विद्वान् पुरुषोंको
ये पाँच प्रकारके श्राद्ध जानने चाहिये। ग्रहण,
संक्रान्ति, पूर्णिमा या अमावास्या पर्व, उत्सवकाल
तथा महालयके अवसरपर मनुष्य तीन पिण्ड दे
और मृत्यतिथिको एक ही पिण्ड दे। जिस
कन्याका विवाह नहीं हुआ है, वह पिण्ड, गोत्र
और सूतकके विषयमें पिताके गोत्रसे पृथक् नहीं
है। पाणिग्रहण और मन्त्रोंद्वारा वह अपने पिताके
गोत्रसे पृथक् होती है। जिस कन्याका विवाह
जिस वर्णके साथ होता है, उसके समान उसे
सूतक भी लगता है। उसके लिये पिण्ड और
तर्पण भी उसी वर्णके अनुसार होने चाहिये।
विवाह हो जानेपर चौथी रातमें वह पिण्ड, गोत्र
और सूतकके विषयमें अपने पतिके साथ एक हो
जाती है। मृत व्यक्तिके प्रति हितबुद्धि रखनेवाले
बन्धुजनोंको शवदाहके प्रथम, द्वितीय, तृतीय
अथवा चतुर्थ दिन अस्थि-संचय करना चाहिये
अथवा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंका अस्थि-संचय
क्रमशः चौथे, पाँचवें, सातवें और नवें दिन भी
कर्तव्य बताया गया है। जिस मृत व्यक्तिके लिये
ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग किया जाता है, वह
प्रेतलोकसे मुक्त और स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता