संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context* उत्तरभाग * ७३१
अनरकतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छूट जाता है। देवि! तदनन्तर उत्तम काम्यकवनमें जाना चाहिये। जिसमें प्रवेश करते ही सब पापराशियोंसे छुटकारा मिल जाता है। फिर आदित्यवनमें जाकर आदित्यके दर्शनसे ही मानव मोक्षका भागी होता है। रविवारको वहाँ स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पा लेता है और यज्ञोपवीतिकतीर्थमें स्नान करके वह स्वधर्मफलका भागी होता है। तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानव चतुःप्रवाह नामक तीर्थमें स्नान करे। इससे वह सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाकर स्वर्गलोकमें देवताकी भाँति आनन्दित होता है। विहारतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष सब प्रकारके सुख पाता है। दुर्गातीर्थमें स्नान प्राप्त कर लेता है और शरीरका अन्त होनेपर वह स्वर्गलोकमें जाता है। शुक्रतीर्थमें स्नान करके श्राद्धदान करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। विशेषतः चैत्र मासके कृष्णपक्षमें अष्टमी या चतुर्दशी तिथिको वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। ब्रह्मतीर्थमें उपवास करनेवाला पुरुष निःसन्देह मोक्षका भागी होता है। तदनन्तर स्थाणुतीर्थमें स्नान करके स्थाणुवटका दर्शन करनेसे कुरुक्षेत्रकी यात्रा पूरी हो जाती है।
देवि! मैंने तुम्हें कुरुक्षेत्रका माहात्म्य ठीक-ठीक बताया है। कुरुक्षेत्रके समान दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। वहाँ किया हुआ इष्टापूर्त कर्म, तप, विधिपूर्वक होम और दान आदि सब कुछ अक्षय होता है। मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, महापात (व्यतीपात), संक्रान्ति तथा अन्य पुण्यपर्वोंके दिन कुरुक्षेत्रमें स्नान करनेवाला पुरुष अक्षय फलका भागी होता है। महात्मा पुरुषोंके कलियुगजनित पापोंका शोधन करनेके लिये ब्रह्माजीने सुखदायक कुरुक्षेत्रतीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य इस पापनाशक पुण्यकथाका भक्तिभावसे कीर्तन अथवा श्रवण करता है, वह भी सब पापोंसे छूट जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें जो-जो वस्तुएँ देता है, उसी-उसीको वह सदा प्रत्येक जन्ममें पाता है। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! बहुत कहनेसे क्या लाभ! मेरा निश्चित विचार सुनो, यदि कोई संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहे तो उसे कुरुक्षेत्रका सेवन करना ही चाहिये।
करके मानव कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। तदनन्तर पितृतीर्थ नामक सरस्वती कूपमें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करनेवाला पुरुष उत्तम गतिको पाता है। प्राची सरस्वतीमें स्नान और विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य दुर्लभ कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।