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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

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Page 722

७२० * संक्षिप्त नारदपुराण *


मण्डलाकार पुष्पमण्डप बनावे और भगवच्चिन्तन करते हुए रातमें जागरण करे। भगवान् वासुदेवकी कथा और गीतका भी आयोजन करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष भगवान्‌का ध्यान, पाठ और स्तवन करते हुए रात बितावे। तदनन्तर निर्मल प्रभात-काल आनेपर द्वादशीको बारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण स्नातक, वेदोंके पारगामी, इतिहास-पुराणके ज्ञाता, श्रोत्रिय और जितेन्द्रिय होने चाहिये। इसके बाद स्वयं भी विधिपूर्वक स्नान करके धुला हुआ वस्त्र पहने और इन्द्रियसंयमपूर्वक भक्तिभावसे पहलेकी भाँति वहाँ विराजमान पुरुषोत्तमको स्नान करावे; फिर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, उपहार आदि नाना प्रकारके उपचारोंसे तथा प्रणाम, परिक्रमा, जप, स्तुति, नमस्कार और मनोहर गीत-वाद्योंद्वारा भगवान् जगन्नाथकी पूजा करे। भगवत्पूजनके पश्चात् ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। उनके लिये बारह गौएँ दान करके भक्तिपूर्वक सुवर्ण, छतरी, जूते और काँसपात्र आदि समर्पित करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको खीरसहित पक्वान्न भोजन करावे। उन भोज्यपदार्थोंमें गुड़ और शक्करका मेल होना चाहिये। जब ब्राह्मण लोग भोजन करके भलीभाँति तृप्त एवं प्रसन्नचित्त हो जायँ, तब उनके लिये जलसे भरे हुए बारह घट दान करे। उन घड़ोंके साथ लड्डु और यथाशक्ति दक्षिणा भी होनी चाहिये। ब्रह्मपुत्री! तत्पश्चात् विष्णुतुल्य ज्ञानदाता गुरुकी पूर्ण भक्तिके साथ पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, गौ, धान्य, द्रव्य तथा अन्य मनोवाञ्छित वस्तुएँ देकर उनकी पूजा सम्पन्न करे; फिर नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

सर्वव्यापी जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः।
अनादिनिधनो देवः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥
(ना० उत्तर० ६१।७४)

'शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सर्वव्यापी, अनादि और अनन्त देवता जगदीश्वर भगवान् पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों।'

यों कहकर गुरु एवं ब्राह्मणोंकी आदरपूर्वक तीन बार परिक्रमा करे; फिर चरणोंमें भक्तिपूर्वक सिर नवाकर आचार्यसहित ब्राह्मणोंको विदा करे। तत्पश्चात् गाँवकी सीमातक भक्तिपूर्वक उन ब्राह्मणोंके साथ-साथ जाय और उन्हें नमस्कार करके लौटे। फिर स्वजनों और बान्धवोंके साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करके स्त्री हो या पुरुष वह एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाता है एवं सूर्यतुल्य विमानके द्वारा विष्णुलोकको जाता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका फल बताया है, जो मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला है।


प्रयाग-माहात्म्यके प्रसङ्गमें तीर्थयात्राकी सामान्य विधिका वर्णन

**वसिष्ठजी कहते हैं—**भूपाल! भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले इस पुरुषोत्तम-माहात्म्यको सुनकर ब्रह्मपुत्री मोहिनीने अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पुनः प्रश्न किया।

**मोहिनी बोली—**विप्रवर! मैंने पुरुषोत्तमतीर्थका अद्भुत माहात्म्य सुना। सुव्रत! अब प्रयागका भी माहात्म्य कहिये।

**पुरोहित वसुने कहा—**भद्रे! सुनो, मैं तीर्थयात्राकी विधि बतलाता हूँ, जिसका आश्रय लेनेपर मनुष्य यात्राका शास्त्रोक्त फल पा सकता है। तीर्थयात्रा पुण्यकर्म है। इसका महत्त्व यज्ञोंसे भी बढ़कर है। बहुत दक्षिणावाले अग्निष्टोमादि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो तीर्थयात्रासे सुलभ होता है। जो अनजानमें भी कभी यहाँ तीर्थयात्रा कर लेता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो स्वर्गलोकमें