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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

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७१८* संक्षिप्त नारदपुराण *

आपकी जय हो। देवश्रेष्ठ! समुद्रमें शयन करनेवाले माधव! योगेश्वर! आपकी जय हो। विश्वमूर्ते! चक्रधर! श्रीनिवास! आपकी जय हो। कच्छपावतार! आपकी जय हो। शेषशायिन्! धर्मवास! गुणनिधान! आपकी जय हो। शान्तिकर! ज्ञानमूर्ते! भाववेद्य! मुक्तिकर! आपकी जय हो, जय हो। विमलदेह! सत्त्वगुणके निवासस्थान! गुणसमूह! आपकी जय हो, जय हो। निर्गुणरूप! मोक्षसाधक! आपकी जय हो। लोकशरण! लक्ष्मीपते! कमलनयन! सृष्टिकर! आपकी जय हो, जय हो। आपका श्रीविग्रह तीसीके फूलकी भाँति श्याम एवं सुन्दर है; आपकी जय हो। आपका श्रीअङ्ग शेषनागके शरीरपर शयन करता है; आपकी जय हो। भक्तिभावन! आपकी जय हो, जय हो। परमशान्त! आपकी जय हो। नीलाम्बरधारी बलराम! आपकी जय हो। सांख्यवन्दित! आपकी जय हो। पापहारी हरे! आपकी जय हो। जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। बलरामजीके अनुज! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देव! आपकी जय हो। वनमालासे आवृत वक्षवाले नारायण! आपकी जय हो। विष्णो! आपकी जय हो। आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र आदि देवता, सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा अन्य स्वर्गवासी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न होते हैं। वे तन्मय चित्तसे श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रादेवीका दर्शन, स्तवन एवं नमस्कार करके अपने-अपने निवासस्थानको चले जाते हैं। पुष्करतीर्थमें सौ बार कपिला गौका दान करनेसे अथवा सौ कन्याओंका दान करनेसे जो फल कहा गया है उसीको मनुष्य मञ्चपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे पा लेता है। सबका आतिथ्यसत्कार करनेसे, विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करनेसे, ग्रीष्मऋतुमें जलदान देनेसे, चान्द्रायण करनेसे, एक मासतक निराहार रहनेसे तथा सब तीर्थोंमें जाकर व्रत और दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मञ्चपर विराजमान सुभद्रासहित श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेसे मिल जाता है। अतः स्त्री हो या पुरुष सबको उस समय पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। मोहिनी! भगवान् श्रीकृष्णके स्नान किये हुए शेष जलसे यदि विधिपूर्वक अभिषेक किया जाय तो वन्ध्या, मृतवत्सा, दुर्भगा, ग्रहपीड़िता, राक्षसगृहीता तथा रोगिणी स्त्रियाँ तत्काल शुद्ध हो जाती हैं। और सुप्रभे! जिन-जिन मनोरथोंको वे चाहती हैं उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेती हैं। अतः जलशायी भगवान् श्रीकृष्णके स्नानावशेष जलसे अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सींचना चाहिये। जो लोग स्नानके पश्चात् दक्षिणाभिमुख जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थोंकी यात्रा करनेका जो फल कहा गया है तथा गङ्गाद्वार, कुब्जाम्र तथा कुरुक्षेत्रमें एवं पुष्कर आदि अन्य तीर्थोंमें सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे जो फल बताया गया है एवं वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा संहिता आदि ग्रन्थोंमें पुण्यकर्मका जो फल बताया गया है, उसे मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शनमात्र करके पा लेता है।

भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा—ये रथपर विराजमान होकर जब गुण्डिचा* मण्डपकी यात्रा करते हैं उस समय जो उनका दर्शन करते हैं, वे श्रीहरिके धाममें जाते हैं। गुण्डिचा-यात्राके समय फाल्गुनकी पूर्णिमाको विषुव योगमें जो


* गुण्डिचा नामक उद्यान-मन्दिर, जो पुरीमें इन्द्रद्युम्नसरोवरके तटपर स्थित है। इसके गुण्डिचा, गुडिवा आदि नाम भी मिलते हैं।