संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 718 of 770
Read in context७१६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
इस प्रकार मन्त्रका उच्चारण करके विधिपूर्वक स्नान करे और देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्यान्य लोगोंका तिल और जलसे तर्पण करके मौनभावसे आचमन करे। फिर पितरोंको पिण्डदान दे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन करे। ऐसा करनेवाला मानव दस अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है। इस प्रकार पञ्चतीर्थका सेवन करके एकादशीको उपवास करे। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमाको भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है वह पूर्वोक्त फलका भागी होकर दिव्यलोकमें क्रीड़ा करके उस परम पदको प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटकर नहीं आता। पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदी, सरोवर, पुष्करिणी, तालाब, बावड़ी, कुआँ, हद और समुद्र हैं, वे सब ज्येष्ठके शुक्लपक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक एक सप्ताह प्रत्यक्षरूपसे पुरुषोत्तम-तीर्थमें जाकर रहते हैं। यह उनका सदाका नियम है। सती मोहिनी ! इसीलिये वहाँ स्नान, दान, देव-दर्शन आदि जो कुछ पुण्यकार्य उस समय किया जाता है, वह अक्षय होता है। मोहिनी! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि दस प्रकारके पापोंको हर लेती है। इसीलिये उसे 'दशहरा' कहा गया है। जो उस दिन उत्तम व्रतका पालन करते हुए बलराम, श्रीकृष्ण एवं सुभद्रादेवीका दर्शन करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो मनुष्य फाल्गुनकी पूर्णिमाके दिन एकचित्त हो पुरुषोत्तम श्रीगोविन्दको झूलेपर विराजमान देखता है वह उनके धाममें जाता है। सुलोचने! जिस दिन विषुव-योग हो, वह दिन प्राप्त होनेपर विधिपूर्वक पञ्चतीर्थका सेवन करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राका दर्शन करनेवाला मनुष्य समस्त यज्ञोंका दुर्लभ फल पाता है और सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो वैशाखके शुक्लपक्षमें तृतीयाको श्रीकृष्णके चन्दनचर्चित स्वरूपका दर्शन करता है, वह उनके धाममें जाता है। ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको यदि वृषराशिके सूर्य और ज्येष्ठा नक्षत्रका योग हो तो उसे 'महाज्येष्ठी' पूर्णिमा कहते हैं। उस समय मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। मोहिनी! महाज्येष्ठी पर्वको श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करके मनुष्य बारह यात्राओंका फल पाता है। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, हरिद्वार, कुशावर्त, गङ्गासागर-सङ्गम, कोकामुख-शूकरतीर्थ, मथुरा, मरुस्थल, शालग्रामतीर्थ, वायुतीर्थ, मन्दराचल, सिन्धुसागरसङ्गम, पिण्डारक, चित्रकूट, प्रभास, कनखल, शङ्खोद्धार, द्वारका, बदरिकाश्रम, लोहकूट, सर्वपापमोचन-अश्वतीर्थ, कर्दमाल, कोटितीर्थ, अमरकण्टक, लोलार्क, जम्बूमार्ग, सोमतीर्थ, पृथूदक, उत्पलावर्तक, पृथुतुङ्ग, कुब्जतीर्थ, एकाम्रक, केदार, काशी, विरज, कालञ्जर, गोकर्ण, श्रीशैल, गन्धमादन, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, पारियात्र, हिमालय, सह्य, शुक्तिमान्, गोमान्, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, गोमती तथा ब्रह्मपुत्र आदि तीर्थमें जो पुण्य होता है और महाभागे! गोदावरी, भीमरथी, तुङ्गभद्रा, नर्मदा, तापी, पयोष्णी, कावेरी, क्षिप्रा, चर्मण्यवती, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), शतद्रू (शतलज), बाहुदा, ऋषिकुल्या, मरुद्वृधा, विपाशा (व्यास), दृषद्वती, सरयू, आकाशगङ्गा, गण्डकी, महानदी, कौशिकी (कोसी), करतोया, त्रिस्त्रोत्रा, मधुवाहिनी तथा महानदी वैतरणी और अन्यान्य नदियाँ, जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, वे सभी पुण्यमें श्रीकृष्णदर्शनकी समानता नहीं कर सकती। सूर्य-ग्रहणके समय स्नान और दानसे जो फल होता है, महाज्येष्ठी पर्वको भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके मनुष्य उसी फलको प्राप्त कर लेता है।
वहाँ एक सजल कूप है जो बड़ा ही पवित्र और सर्वतीर्थमय है। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको उसमें